पुण्यतिथि- 24 जून विशेष 

भारत का इतिहास सदैव ही गौरवपूर्ण रहा है। अपने आत्मसम्मान और देश प्रेम के लिए प्राण उत्सर्ग करने वाली नारियों की वीर गाथाएं देश के घर घर में गूंजती हैं ।ऐसी ही  एक वीरांगना  के शौर्य व साहस को प्रकाशमान करता है जबलपुर के समीप नरई नाला के पास बरेला में स्थित रानी दुर्गावती का समाधि स्थल, जहां आज भी गोंड जनजाति के लोग अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने जाते हैं ।अपने 16 वर्षों के शासनकाल में रानी  दुर्गावती ने अपनी प्रजा पालन ,कुशल प्रशासन, और योग्य नेतृत्व के बल पर ना सिर्फ अपनी प्रजा के हृदय पर एक अमिट छाप छोड़ी थी अपितु शत्रु पक्ष को भी प्रशंसा करने पर बाध्य कर दिया था। अकबर के दरबारी लेखक अबुल फजल ने आईने अकबरी में लिखा है - 'दुर्गावती के शासनकाल में गोंडवाना इतना समृद्ध था  कि  प्रजा लगान की अदायगी स्वर्ण मुद्राओं और हाथियों से करती थी।' 
रानी दुर्गावती  बुंदेलखंड महोबा के चंदेलवंशीय शासक कीर्तिराय  की इकलौती संतान थी । 5 अक्टूबर सन 1524  को दुर्गा अष्टमी के दिन कालिंजर के किले में इस वीरांगना का जन्म हुआ। दुर्गा अष्टमी के दिन जन्म लेने के कारण नाम रखा गया दुर्गावती। अपने नाम को चरितार्थ करती हुई दुर्गावती तीरंदाजी तथा बंदूक चलाने में विशेष निपुण थी। शेर, चीता और तेंदुए का शिकार उनका विशेष शौक था। साथ ही  पिता के साथ राज्य कार्य में भी बराबर सक्रिय रहती थी।  

दुर्गावती की सुंदरता  वीरता व अन्य गुणों की ख्याति चारों तरफ थी जिससे प्रभावित होकर गढ़ मंडला के शासक संग्रामशाह  अपने पुत्र दलपतशाह के लिए दुर्गावती को अपनी पुत्र वधू बनाना  चाहते थे , परंतु दलपत राय राजकुमार ना होकर गोंड जाति के थे।  अतः चंदेलवंशी कट्टरवादी कीर्तिराय अपने से निम्न जाति में कन्या देने के पूर्णतः विरुद्ध थे। यद्यपि दुर्गावती भी दलपतराय की ख्याति व गुणों से अत्यंत प्रभावित थीऔर उन्हें पति रूप में वरण करना चाहती थी। अंततः संग्रामशाह और  कीर्तिराय के मध्य इस विषय को लेकर युद्ध हुआ जिसमें संग्रामशाह ने  कीर्तिराय को पराजित कर दुर्गावती को अपनी पुत्रवधू बनाया । दुर्भाग्यवश विवाह के 4 वर्ष उपरांत ही दुर्गावती की गोद में 3 वर्षीय पुत्र वीरनारायण को छोड़कर राजा दलपतराय स्वर्गवासी हो गए । प्रथमतः तो दुर्गावती पति के साथ सती हो जाना चाहती थी परंतु शुभचिंतकों के समझाने पर अपने पुत्र के हित के लिए उन्होंने उसकी संरक्षिका बनकर राज्य कार्य को संभाला।
      सर्वप्रथम दुर्गावती ने अपनी राजधानी सिंगौरगढ़  किला को (जो कि वर्तमान में दमोह जिले के पास संग्रामपुर में है) चौरागढ़ किला से स्थानांतरित कर दिया। दुर्गावती ने एक तरफ अनेक भवन मंदिर धर्मशालायें तालाब आदि के निर्माण के द्वारा राज्य को परिपुष्ट व सुसज्जित किया, तो दूसरी तरफ अपनी योग्य सैनिक प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए एक शक्तिशाली सेना का गठन कर राज्य की सुरक्षा  की बागडोर संभाली।  रानी गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ मंडला सहित 52 गढ़ों के लगभग 35000 गांवों की शासिका थी । जबलपुर में अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल ,तथा अपने स्वामीभक्त मंत्री आधारसिंह के नाम पर आधार ताल का निर्माण कराया । उसके राज्य में तथा प्रजा सुखी व संपन्न थी अतः रानी को प्रजा का पूरा स्नेह व विश्वास प्राप्त था।   उनके  राज्य की समृद्धि की ख्याति  चारों तरफ  व्याप्त थी। 
    गढ़ मंडला की ख्याति ने सर्वप्रथम मालवा के शासक बाजबहादुर को आक्रमण करने के लिए आकर्षित किया ।1555 से 1560 के मध्य बाजबहादुर ने अनेक बार  गढ़ मंडला पर आक्रमण किया परंतु प्रत्येक बार उसे रानी से मुंह की खानी पड़ी। निरंतर अपनी शक्ति का विकास करते हुए रानी ने मालवा और बंगाल पर भी अधिकार कर लिया ।
     साम्राज्यवादी  मुगल शासक अकबर को भी गोंडवाना की बढ़ती हुई शक्ति और वैभव ने आकृष्ट किया । अकबर ने गुप्तचरों के माध्यम से रानी दुर्गावती के कुछ लोभी व स्वार्थी सरदारों को खरीद लिया, उसके पश्चात युद्ध के आधार का निर्माण करते हुए उसने दुर्गावती से उसके प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और विश्वासपात्र मंत्री आधारसिंह की भेंट स्वरूप मांग की, जिसे स्वाभिमानी रानी ने ठुकरा दिया।  परिणामतः अकबर ने अपने सेनापति व रिश्तेदार आसफ खाँ  के नेतृत्व में गोंडवाना पर आक्रमण करने के लिए सेना भेजी। रानी दुर्गावती के शौर्य के आगे आसफ खाँ टिक ना सका और पराजित हुआ । आसफ खाँ की पराजय से लज्जित अकबर ने डेढ़ वर्ष पश्चात  पुनः दुगनी तैयारी के साथ तिलमिलाए हुए आसफ खाँ को गोंडवाना पर आक्रमण के लिए भेजा।  इस बार मुगल सेना के अनुपात में रानी की सेना संख्या में अत्यंत कम थी, परंतु रानी ने पूरे आत्मविश्वास व साहस के साथ जबलपुर के नर्रई नाले के पास मोर्चा लगाया, तथा स्वयं पुरुष वेश  में युद्ध का संचालन किया। जिसमें 3000 मुगल सैनिकों की क्षति के साथ आसिफ खाँ  पराजित हुआ यद्यपि इसमें रानी की भी अपार क्षति हुई । अगले दिन जब गढ़ मंडला में विजय उत्सव मनाया जा रहा था आसफ खाँ ने रानी के कुछ सरदारों को धन का लालच देकर खरीद लिया तथा उनसे गढ़ मंडला की सारी गुप्त जानकारियां लेकर  पुनः आक्रमण किया । उस दिन रानी का पुत्र वीरनारायण  युद्ध स्थल पर  युद्ध करते हुए घायल हो कर घोड़े से गिर गया परंतु दुर्गावती विचलित ना हुई और  उसे सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने का आदेश देकर युद्ध स्थल पर ही डटी रही।जब रानी के कुछ विश्वासपात्रों ने  कहा कि वह पुत्र के अंतिम दर्शन कर ले तो वीर रानी ने उत्तर दिया - 'यह पुत्र से मिलने का समय नहीं है मुझे खुशी है कि मेरे पुत्र ने युद्ध भूमि में वीरगति पाई है मैं उससे देवलोक में ही मिलूंगी ।' 
युवा पुत्र की इस स्थिति ने रानी के लहू में जैसे दुगने उत्साह का संचार कर दिया उसकी तलवार दुश्मनों के सर काट काट कर  गिरा ही रही थी कि तभी एक तीर आकर कर रानी के भुजा में लगा जिसे रानी ने स्वयं अपने हाथ से निकाल फेंका ,दूसरा तीर आकर रानी की आंख में लगा, रानी ने उसे भी स्वयं ही निकाला परंतु तीर की नोक आंख मे ही गड़ी रह गई ,तभी तीसरा तीर आया  और रानी के गर्दन में धंस गया । मृत्यु  सन्निकट जानकर रानी ने दुश्मन के हाथ में पड़ने की अपेक्षा मृत्यु को श्रेयस्कर समझते हुए मंत्री आधारसिंह से आग्रह किया कि वे अपनी तलवार से रानी की गर्दन काट दे । आधार सिंह के इस कार्य में असमर्थता  व्यक्त करने पर रानी  स्वयं अपनी ही कटार अपने सीने में भोंककर मृत्यु का वरण किया। 
जबलपुर में विश्वविद्यालय, महाविद्यालय संग्रहालय सहित अनेक भवन  जिनका नाम दुर्गावती के नाम पर रखा गया है आज भी रानी दुर्गावती के यश और शौर्य की सुगंध से सुवासित हैं । बुंदेलखंड की इस वीरांगना के  त्याग वीरता व आत्म बलिदान को इतिहास सदैव याद रखेगा।

-सोनिया सिंह

एम ए नेट पीएचडी शोधार्थी