जहां देश की राजधानी का नाम, वहीं पानी का संकट गहरा; ग्रामीणों ने सुनाई अपनी पीड़ा
मऊगंज: देश की राजधानी नई दिल्ली का नाम सुनते ही आधुनिक सुविधाओं, चौड़ी सड़कों और विकास की तस्वीर सामने आती है, लेकिन मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में स्थित इसी नाम के एक गांव में जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। इस गांव के सैकड़ों परिवार पिछले करीब चालीस वर्षों से पीने के पानी के लिए पहाड़ों के बीच लगभग सौ फीट गहरी खाई में उतरने को मजबूर हैं। पथरीली और फिसलन भरी चट्टानों के बीच बहने वाला एक छोटा सा प्राकृतिक झरना ही पूरे गांव की प्यास बुझाने का एकमात्र साधन बना हुआ है, जहां इंसान, मवेशी और जंगली जानवर सभी एक ही जल स्रोत पर निर्भर हैं।
दशकों से जारी है पानी के लिए ग्रामीणों का जानलेवा संघर्ष
इस गांव में सुबह की शुरुआत घरेलू कामकाज से नहीं बल्कि पानी जुटाने की कठिन परीक्षा के साथ होती है। महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे-छोटे बच्चे सिर पर बर्तन लेकर बेहद खतरनाक खाई में उतरते हैं। नीचे पहुंचने के बाद पानी भरना और फिर भारी मटकों को सिर पर रखकर खड़ी चढ़ाई चढ़ना बेहद जोखिम भरा काम है, जहां एक छोटी सी चूक सीधे गहरी खाई में गिरा सकती है। गर्मी, सर्दी या बारिश, हर मौसम में ग्रामीणों की यह जानलेवा दिनचर्या लगातार जारी रहती है और पानी भरने के दौरान कई लोग गिरकर गंभीर रूप से घायल भी हो चुके हैं।
सरकारी योजनाओं के दावों के बीच अधर में लटकी व्यवस्था
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में वर्षों पहले दिखावे के लिए नल तो लगा दिए गए, लेकिन उनमें आज तक पानी की एक बूंद भी नहीं आई। जल जीवन मिशन के तमाम दावों के बावजूद नल-जल योजना की पाइपलाइन गांव के घरों तक नहीं पहुंच सकी है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि यहां आकर बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव को अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है, जिससे यह क्षेत्र आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है।
प्रसिद्ध जलप्रपात के साये में प्यास बुझाने की बड़ी विडंबना
यह गांव मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध और सबसे गहरे बहुती जलप्रपात के बिल्कुल नजदीक स्थित है। हर साल हजारों पर्यटक यहां की प्राकृतिक खूबसूरती का आनंद लेने और कैमरों में तस्वीरों को कैद करने पहुंचते हैं, लेकिन उसी जलप्रपात की छाया में बसे इस गांव के लोग पीने के पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। बरसात के दिनों में मिट्टी और गंदगी मिलने से यह पानी पूरी तरह दूषित हो जाता है, जिससे गांव में पेट दर्द, उल्टी और दस्त जैसी जलजनित बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है और लोग बीमार हो रहे हैं।
दशकों पुरानी मांग पर अब तक नहीं हुआ कोई स्थायी समाधान
पिछले चालीस सालों से ग्रामीण लगातार प्रशासन, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से स्वच्छ पेयजल की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें केवल खोखले आश्वासन ही हाथ लगे हैं। सरकार के हर घर जल के दावों के बीच यह गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस गंभीर समस्या का संज्ञान लेकर कोई ठोस कदम उठाएगा, या फिर इस गांव के लोगों को आने वाले समय में भी अपनी प्यास बुझाने के लिए इसी तरह अपनी जिंदगी दांव पर लगानी पड़ेगी।

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