एम पी बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के 10 वें अधिवेशन का उद्घाटन  इंदौर प्रेस क्लब के माथुर सभागृह में कामरेड परवाना, कामरेड मेनन, कामरेड श्रीधरन को स्मरण करते हुए अतिथियों द्वारा दीप प्रज्जवलन कर किया गया।  
श्री आलोक खरे ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि बैंक अधिकारीयों का पहला अधिवेशन इंदौर में ही 13 फरवरी 1981 को हुआ था।  तब अधिकारीयों की यूनियन का अलग से रजिस्ट्रेशन नहीं होता था।  इस संगठन ने बैंक अधिकारीयों के हितों के संघर्ष करने के साथ समाजसेवा के भी कई कार्य किये हैं। 
इसके बाद यूनियन के जुझारू श्री प्रकाश शर्मा, श्री एस के दुबे , श्री सुरेश उपध्याय का सम्मान भी किया गया।  


इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष श्री अरविन्द तिवारी द्वारा स्वागत भाषण दिया गया।  उन्होंने इंदौर के मीडिया के तरफ से आश्वाशन दिया कि जब भी संगठन कोई सार्थक आंदोलन करेगा मीडिया उनके साथ होगा।  
आल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के महासचिव कामरेड एस नागराजन ने कामरेड परवाना के साथ जुड़े अपने संस्मरण सुनाये।  उन्होंने बताया कि वर्त्तमान सरकार बैंकिंग ढांचे को बर्बाद करना चाहती है।संसद  में  पूनम गुप्ता रिपोर्ट को विपक्ष के विरोध के बावजूद 15 मिनिट में प्रस्ताव पारित कर इस  आधार पर बैंकों का पुनर्गठन करना चाहती है जो कि बैंकिंग सेक्टर को समाप्त करने का कार्य है ।    श्रीलंका में जो हुआ वह भारत में भी हो सकता है। आज रुस से ऑइल  अडानी के माध्यम से खरीदा जाता है और अडानी के माध्यम से ही फ्रांस को बेचा जा रहा है।  देश में मॅहगाई अपने चरम पर है।  रिज़र्व बैंक बार बार ब्याज की दर बढ़ा कर महंगाई को रोकने का प्रयास कर रही है।   यहाँ  अघोषित आपातकाल चल रहा है जो कभी भी घोषित हो सकता है।  गैस सिलेंडर की तेजी से बढ़ती कीमत महगाई के आंकलन का एक उदाहरण है  । रूस यूक्रेन के कारण भी महंगाई  बढ़  रही है।   2024 में सरकार अडानी,अम्बानी और अमित शाह  द्वारा ही चलाई जाएगी।  पहले 3 बैंकों को वेन्टीलेटर पर बताया गया था जो निजीकरण का प्रयास है ये बैंकें आज अपने अधिकारीयों और कर्मचारियों के कारण प्रॉफिट मेकिंग बैंक बन गयी है।  भविष्य में 4 राष्टीयकृत बैंकें ही बचेगी।  स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में भी विभाजन हो गया है।  वहां कार्य और विभागों के आधार पर बंटवारा  करके उसका निजीकरण होता जा रहा है। यूको बैंक में जो प्रमोशन हो रहे है मे उसमें ए आई (आर्टिफीसियल इंटेलिजेंसी ) की भूमिका सर्वोपरि हो गई है। आईडीबीआई के बारे में भी उन्होंने तथ्य बताये।  अब बैंकों को उनके जनरल मैनेजर आदि बैंक का सञ्चालन नहीं करते वरन सरकार के सचिवो द्वारा होता है। आर्थिक नीति सरकार के अधिकारी तय करते हैं।  तकनीक की तेजी से बेरोजगारी बढ़ती जा रही है आर्थिक ढांचा तहस नहस हो चूका है।  यह क्राइसेस बढ़ता जा रहा है। डिजिटल करेंसी की घोषणा हो गयी है एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में अभी 83  % ट्रांज़ैक्शन डिजिटल हो रहे हैं , अब इससे बैंकों पर कारोबार की निर्भरता कम हो रही है।सरकार सार्वजानिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण पर आमादा है भारतीय जीवन बीमा  निगम इसका उदाहरण है।  सरकारी योजनाओं को राष्टीयकृत बैंकें ही क्रियान्वित करती है और उनको ही सरकार समाप्त करने में लगी है। यह सही कहा जाता है कि नुकसान बुरे लोगों से नहीं होता वरन अच्छे लोगों के ना बोलने से होता है।
देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. अरुणकुमार ने अधिवेशन को सम्बोधित करते हुआ कहा कि देश की अर्थव्यवस्था सरकार से नहीं वरन विश्व अर्थव्यवस्था से चल  रही  है। आधुनिक अर्थशास्त्र में वित्त और बैंकिंग महत्वपूर्ण होते हैं।  हाल ही में डिजिटल करंसी शुरू हुई है ,यह बैंकिंग प्रणाली पर कदम रोकने का प्रयास है।  डिजिटल  करंसी से घर में ही काम हो जायेगा।  बैंकिंग का यह मशीनीकरण ही है। आर्टिफीसियल इंटेलिजेंट से बेरोजगारी बढ़ेगी।  डॉलर बढ़ रहा है और बाकि करेंसी गिर रही है। हमारा देश वैश्वीकरण की तरफ चल रहा है।  एक तरफ़ा वैश्वीकरण से हमारा नुकसान हुआ है।  ऊपर का तो विकास हुआ है पर नीचे  के स्तर पर हम पीछे हो गए हैं ।  यह अपने आप में विरोधाभासी है कि स्टॉक मार्किट तेजी पर है और अर्थव्यवस्था नीचे जा रही है।  नयी आर्थिक नीतियां विश्व बैंक से प्रभावित होती है। बाजारीकरण हावी होता जा रहा है। ग्लोबल क्राइसेस ने पूंजीवाद का असली चेहरा दिखा दिया है। वारेन बुफे ने कहा था यदि पूंजीवादी अधिक टेक्स दे तो अर्थव्यवस्था का कुछ ओर  ही रूप होगा। आज विश्व अर्थव्यवस्था में अधिक असमानता दिख रही है। संगठित क्षेत्र आगे है तो असंगठित क्षेत्र पीछे है।  दोनों में गेप बढ़ रही है और संघर्ष हो रहा है।  रूस यूक्रेन युद्ध अमिर देशों के बीच  का संघर्ष है। ग्लोबल इकॉनामी बबल इकॉनामी में बदल गयी है। मुद्रास्फीति बढ़ रही है और ब्याज दर गिर रही है।  यह मंदी का दौर चल रहा है। बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है जबकि गरीब ओर  गरीब और  अमिर ओर अमिर होते जा रहे हैं । नोटबंदी और जीएसटी से भी भारी नुकसान हुआ है।  बड़ी कंपनियां विकास कर रही है जबकि असंगठित क्षेत्र का नुक्सान हुआ है।  सप्लाई साइड पालिसी चल रही है जिससे इन्वेस्टमेंट में कमी हुई है। इन्वेस्टमेंट 36 % से घटकर 30 % रह गया है। गरीब के हाथ में पैसा नहीं होने से डिमांड में कमी आयी है। काला धन भी एक समस्या है जिनके पास काला धन है वे खर्च नहीं करते। काले धन ने सभी नीतियां फ़ैल कर दी है।  रिज़र्व बैंक को मुद्रास्फीति कम करने के प्रयास करने होंगे।  इसकी गलत अवधारणा से असंगठित क्षेत्र की आय सबसे कम है। काला धन देश के 3 % लोगों के हाथ में है जबकि 97 % लोग इसका नुकसान उठा रहे हैं । देश में बचतकर्ता (सेवर) और इन्वेस्टर अलग अलग हैं । मांग और पूर्ति में भी सामंजस्य नहीं है।  केंद्रीय बैंक का रोल भी बदल गया है। बाजारीकरण ने हमारी सोच को ही बदल दिया है यह उपभोक्तावाद पर निर्भर हो गई है।  इससे हवा पानी जैसी प्राकृतिक  वस्तुएं भी बाजार में बदल गई है। परिवारों के ख़त्म होने से विश्व में तनाव बढ़ा है।  गैरबराबरी तेजी से बढ़ रही है। सेफ्टी नेट पर्याप्त नहीं है रोजगार बढ़ाना होगा। सब्सिडी से नुकसान हो रहा है उसको रोकना होगा। संगठित और असंगठित क्षेत्रों के बीच की खाई कम करना होगी। इसके लिए  हमें एक स्वतंत्र नीति की आवश्यकता है। 
कामरेड विजय शर्मा ने वेतन समझौतों ,बैंकिंग की कर्मचारी नीतियों और  निजीकरण के खिलाफ संघर्ष की बात बताये हुए कहा कि पिछले एक वर्ष में 6 बार 10  लाख बैंक कर्मचारी/अधिकारी हड़ताल कर चुके हैं। यह जंगल राज के विरुद्ध संघर्ष है। कार्यक्रम का सञ्चालन श्री अरविन्द पोरवाल ने किया। कार्यक्रम के अंत में श्री आलोक खरे ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेट कर सभी का आभार व्यक्त किया।