स्त्री विमर्श के विभिन्न आयाम व आकांक्षा के स्वर

महाभारत की कथा व उसके पात्र हमारे चिरपरिचित है, अनेक रचनाकारो ने इस कथा, कथांश व पात्रो को अपने रचनाकर्म का हिस्सा बनाया है. इसी कडी मे मीनाक्षी नटराजन का उपन्यास ‘ अपने अपने कुरूक्षेत्र ‘ सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है. 
मीनाक्षी ने इस उपन्यास मे सत्यवती, गांधारी, कुंती, शिखंडी व द्रोपदी को केंद्र मे रखकर पृथक-पृथक पांच अध्याय मे भीष्म पितामह से संवाद के माध्यम से उपन्यास को बुना है तथा छठवे अध्याय मे भीष्म व कृष्ण के संवाद  के साथ भीष्म के प्रयाण के दृष्य को रचा है.
परस्पर संवाद, आत्म संवाद व अवचेतन मे संवाद की शैली मे इन पात्रो के माध्यम से स्त्री विमर्श के बहुआयामी मुद्दे उठाए गए है तथा पितृ सत्तात्मक समाज के भेदभाव व उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण को रेखांकित किया गया है. सत्यवती (भीष्म की विमाता) का संवाद “ तुम स्वयम को दोष मत दो. तुम भी तो इस पितृ सत्तात्मक समाज का ही अंग हो. इस समाज की चिंतन प्रक्रिया मे स्त्री के अस्तित्व, उसकी इच्छा, अनिच्छा का कोई मोल नही है. वह एक उपकरण मात्र है “, मे इस उपन्यास के केंद्रिय भाव को देखा जा सकता है. इसे और स्पष्ट करते हुए लेखिका  इंद्र-अहिल्या-महर्षि गौतम, सुग्रीव –रोमा (पत्नी)-तारा (बाली की पत्नी), रावण-मंदोदरी-विभिषण (वरण करने के लिए बाध्य) की कथा के उदाहरण भी प्रस्तुत करती है.
“ पितृ सत्तात्मक समाज संकल्पित पुरूष को तो महिमा मंडित करता है, पर पुरूषोचित अहम कठोर प्रतिज्ञारत स्त्री के समक्ष स्वयम को कुंठाग्रस्त अनुभव करता है (गांधारी) “ तथा “ समाज की यह कैसी रीत है ? – स्त्री को बाल्यकाल से ही आभूषणो –अलंकरणो से सजाने के नाम पर अनेक बंधन मे बांधा जाता है, उससे आचरण का साक्ष्य मांगता है, आत्म बलिदान मांगता है, फिर आत्म उत्सर्ग-त्याग की पराकाष्ठा पर उसे प्रात: स्मरणीय घोषित कर देता है “, जैसे संवाद के माध्यम से स्त्री की गरिमा, सम्मान व स्वाभिमान के प्रश्नो को उकेरा गया है.
शिखंडी का संवाद “ समाज तो केवल पूर्ण पुरूष को मान्यता देता है अन्य सब तो जैसे पशु से भी हीन है “ तथा प्रश्न “ मेरी अनुजा द्रोपदी का क्या हश्र हुआ – पांच-पांच राजपुत्रो से विवाह हुआ, पति ने दाव पर लगाया, परिजनो ने कुल वृद्धो के समक्ष निर्वस्त्र करने का प्रयास किया – उससे मेरा यह क्लीवत्व क्या बुरा “ – झकझोर देता है.
स्त्री की पीडा की चरम अभिव्यक्ति द्रोपदी के इस संवाद मे दिखाई देती है - “ मै तो सब मे रम गई, सबकी हो गई. मगर जब मुझे जीवन मे सर्वाधिक आवश्यकता पडी तो मेरे लिए कोई खडा नही हुआ. पांच पति होने पर भी अकेली रह गई. हर पीडिता के मन मे अपराधबोध के बीज बोने का कार्य समाज ही करता है “.
“ अपने अपने कुरूक्षेत्र “ स्त्री के बाल्यकाल से लेकर वृद्धावस्था तक के दुखो, तकलिफो, अनाचारो, अत्याचारो, भेदभावो, उपेक्षाओ के मुद्दो को उठाते हुए रूढिगत सामाजिक मान्यताओ, चितन परम्पराओ व दृष्टिकोण को प्रश्नांकित करता है तथा स्त्री की आशा, आकांक्षा को स्वर देते हुए उनके मान, सम्मान, गरीमा व स्वाभिमान को प्रतिष्ठित करने की चेष्ठा करता है. सामाजिक – पारिवारिक संरचना मे बच्चो के प्रति ध्यान केंद्रित करने, मुक्त मन से उन्हे अपनी बात रखने का अवसर देने तथा मनुष्य की कुंठामुक्ति के लिए संवाद की महत्ता प्रतिपादित करता है. 
युद्ध की विभिषिका का जीवंत दृष्य रचते हुए उपन्यास रेखांकित करता है कि युद्ध से सर्वाधिक प्रभावित भी स्त्रिया ही होती है. युद्ध के विरोध का महत्व प्रतिपादित करते हुए शांति के लिए कोई भी मूल्य चुकाने की आवश्यकता बताई गई है तथा गूढ अर्थ मे ब्रह्मचर्य की व्याख्या की गई है. धर्म को गतिशील निरूपित करते हुए सार्वभौमिक व सार्वकालिक सत्य को विवेक की कसौटी से तय करने की बात कही गई है. मनुष्य के स्वभाव के अडियलपन के कारण मानवीय मूल्यो की उत्पत्ति या स्थापना नही होती बल्कि निरंतर सत्य की खोज से मूल्य बनते है व स्थापित होते है. 
अवतार की प्रतिक्षा किये बगैर लोगो के बीच संवाद स्थापित कर, उन्हे भयमुक्त कर अन्याय व अत्याचार के विरूद्ध एकजूट करने से ही मुक्ति का रास्ता बनेगा अन्यथा भय की बेडियो मे जकडा समाज स्वयम दास हो जाता है, ऐसा कहते हुए मनुष्य की शक्ति व एकता मे विश्वास व्यक्त किया गया है . 
प्रकृति का अद्भूत चित्रण व मानवीकरण लेखिका ने किया है. उपन्यास की भाषा सुगढ, परिपक्व, प्रभावी व प्रवाहमय है, प्रकृति के बिम्बो का अनुठा प्रयोग किया गया है तथा पाठको को आकृष्ट करने व बांधे रखने की क्षमता रखती है. पात्रो की मन:स्थिति, परिस्थितियो, अंतर्द्वंद का विवेकसम्मत, प्रगत, आधुनिक व मानववादी दृष्टि से विवेचन किया गया है. समग्र प्रभाव मे यह उपन्यास स्त्री के प्रति समता का भाव विकसित करने तथा उसे मानवी रूप मे स्वीकार करने की सशक्त पहल है. भय, अन्याय, अत्याचार से मुक्ति के लिए अवतार के बरक्स नागरिको मे परस्पर संवाद व एकजूट होकर संघर्ष की राह दिखाता है. धर्म को गूढ, गतिशील व कालातित मानते हुए उसकी प्रगत व्याख्या करता है. सत्य को विवेक की कसौटी पर परखने की अपील करते हुए मानवीय मूल्यो की स्थापना के महत्व को रेखांकित करता है. 

समीक्षक - सुरेश उपाध्याय

उपन्यास – अपने अपने कुरूक्षेत्र
लेखिका  - मीनाक्षी नटराजन
प्रकाशक  - सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली