वर्तमान हालात छुपे नहीं है कि किस कदर चीन ने भड़काऊ और अमानवीय कृत्य कर पीठ में छुरा भोंक कर यह प्रदर्शन कर रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं ।

आइए कारणों और परिणामों पर एक नजर डालने की कोशिश करें।

तनाव के कारण

भारत चीन के साझा हित कभी नहीं थे और ना है ना होंगे पर परस्पर विरोधी हित जरूर है। इसलिए चीन भारत का कभी भी हितैषी नहीं हो सकता। आप सहज अनुमान लगा सकते हो कि जो आपका मित्र नहीं बन सकता वो विरोधी हितों के कारण शत्रु ही होगा।

ऐतिहासिक कारण- मैक मोहन रेखा को चीन नहीं मानता और उसने काफी ज्यादा भू भाग कब्जाया हुआ है। भारत उस बात को भूल नहीं पाया और ना भूल सकता । यह बात चीन को चैन नहीं लेने देती।

तिब्बत भी एक कारण है और शरणार्थियों को शरण देना एक बड़ा कारण बनता है ।

# चीन की राजनैतिक प्रकृति- चीन अर्ध साम्यवादी है जिसमें पूंजीवाद मिश्रित है। चीन में एक वर्ग विशेष का सत्ता पर कब्जा है और एलीट तानाशाही है। यह ढोंग है कि चीन समयवाद को मानता है और जनता के कल्याण को प्राथमिकता देता है । वास्तव में चीन जितना शोषण और अत्याचार उत्तर कोरिया में भी नहीं होता। चीन के चमकते शहर ग्रामीण चीन की कब्र पर खड़े हैं ।

तनाव, युद्ध और गैर जिम्मेदाराना रवैया एलीट तानाशाही का अभिव्यक्तिकरण है।

# पी ओ के- हाल ही में भारत ने अपने नक्शे में कुछ परिवर्तन किया और उससे पहले जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया जिससे चीन पाकिस्तान व्यापार कॉरिडोर पर संकट के बादल आते दिखे। अगर भारत ऐसा करता है तो चीन की एक टांग टूट जाएगी और चीन का अरब सागर से संपर्क टूट जाएगा।

तात्कालिक कारण यही सबसे महत्वपूर्ण है। चीन भारत का ध्यान अपनी सीमा पर हर हाल में लगाए रखना चाहता है। 

# कोविड 19- कोरोना महाआपदा के बाद चीन दुनिया से अलग थलग हो रहा है और पश्चिम जगत का आकर्षण का केंद्र अब भारत होता जा रहा है। व्यापारिक निगम भारत की  और रुख कर रहे है। इस स्थिति मै भारत को कमजोर साबित कर वो व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सुरक्षा का विश्वास और डर दिखा रहा है।

# जी-7-  भारत का इस समूह में शामिल होने का मतलब है व्यापार का एशियाई केंद्र बनना और सैन्य ताकत में  स्थापित होना। चीन भारत को दबाव में लाना चाहता है और पड़ोसी पहले वाला जुमला याद दिलाना चाहता है।

# नेपाल को आकर्षित करना- शक्तिशाली हाथी ही बुड्ढे  और कमजोर हाथी के बजाय हथिनी को आकर्षित करता है और वही मुखिया बनता है ,यह बात सभी जानवरो और मनुष्य पर भी सटीक है। नेपाल का आकर्षित होने का भी यही कारण है। नेपाल को मालूम है कि भारत के बिना एक घंटे भी सांस नहीं ले सकता। लेकिन सौदेबाजी करने लायक स्थिति में आगया।

# भारतीय विदेश नीति पश्चिम केंद्रित होना - हाल के वर्षों में भारत का झुकाव पूरी तरह अमेरिका और यूरोप की ओर हो गया । यह चीन को समझ में आरहा है कि देर सवेरे उसी के लिए जाल बुना जा रहा है।

यह गलत सही का विषय नहीं है। आज पहले की तरह रूस शक्ति केंद्र नहीं और ना उसकी रुचि भारतीय मामलों में रही। बदलाव होना ही था।

# आंतरिक अशांति- गंभीर असमानता और गरीबी के कारण आंतरिक विद्रोह से जनता का ध्यान हटाने के लिए भी इस परिस्थिति का निर्माण किया।

# पड़ोसियो से तनाव- हांग कांग , ताइवान और दक्षिणी चीन सागर में तनाव से ध्यान हटा कर सख्त संदेश देना।

# चिर परिचित नीति- टिक टिक ठक .......टिक..... ठाक .. अर्थात कुछ ना कुछ करते रहना और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखना चीन की नीति रही है। शांति पसंद नीति नहीं है। इतना करने के बाद शांति से गुफा में बैठना और अचानक से किसी और देश से तनाव बढ़ाना।

क्या करे भारत- सठे साठ्यम समाचरेत  अर्थात जैसे को तैसा। चीन की प्रकृति को समझिए वह उस विवादास्पद कुटिल व्यक्ति की तरह है जिसके सिद्धांत और नियम कानून कभी भी बदल सकते है ।

चीन ने अपने पड़ोसियों को पहले ही सुरक्षात्मक स्थिति में ला दिया है । ज्यादातर पड़ोसियों पर अनेक प्रकार से बढ़त हासिल की जिसे बनाए रखने के लिए चीन आक्रामक स्थिति में ही सहज रह पाता है।

भारत को कुछ बड़े कदम उठाने होंगे जैसे-

* दुश्मन का दुश्मन अपना मित्र होता है और भारत चीन के पड़ोसियों से सामरिक रिश्ते बनाए और आक्रामक संधिया करे।

* एक अलग से प्रशिक्षित बटालियन का गठन करे जो पर्वतीय युद्ध के हालातो से लड़ सके जैसे गोरखा राइफल्स। आई टी बी पी और बीएसएफ से ज्यादा आक्रामक।

* जितना जल्दी हो पाकिस्तान का जमीनी संपर्क चीन से काटे चाहे पी ओ के में अमेरिका सेना के कैंप की अनुमति देने पर रजामंदी देनी पड़े।

* नेपाल से सहयोग बढ़ाने के अतिरिक्त सत्ता का केंद्र वर्तमान सत्ताधारी विचारधारा से अलग बनाने का प्रयास करे।

* आम जनता में भारत विश्वास बढ़ाए और उनको भारत में बसने की सहूलियत प्रदान करे अर्थात पूरी तरह आश्रित बनाए।

* दक्षिण एशियाई देशों से जमीनी संपर्क बढ़ाए और रेलवे सहित सड़क मार्ग का निर्माण करे ।

* भारत अपनी आर्थिक नीतियों की समीक्षा करे और वापस से ग्रामीण अर्थवयवस्था को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करे।

* 2 वर्षीय अनिवार्य सैन्य सेवा या राष्ट्रीय सेवा पाठ्यक्रम में शामिल करे और मजबूत नागरिक तैयार करे।

* गरीबी दूर करने के लिए क्षेत्र आधारित परियोजनाओं और कृषि को बढ़ावा दे।

 वर्तमान चीन युद्ध नहीं चाहेगा पर तनातनी जरूर रखेगा।

सावधानी भी जरूरी है लेकिन अब डरने जैसी बात भारतीय जनमानस में नहीं है।

भारत हमेशा से इस तरह के आक्रमण झेलता रहा है, अब बहादुरी से चीन का सामना कर नेस्तनाबूद करेंगे।

नागरिक और व्यापारी दोनों चीन पर निर्भरता कम करे और विकल्प खोजें। 

चीन तीन तरह की रणनीति पर काम करता है।

दीर्घकालिक जो हर 40-50 वर्ष में दोहराई जाएंगी।

माध्यम जो हर 10-15 वर्ष में कुछ बदलाव करता है।

और तात्कालिक

जिनसे वो एक तीर से कई निशाने साधता है।

बस चाल समझिए और अवसर की तलाश में रहिए सहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।

चीन पर मुसीबतों का  पहाड़ टूटने वाला है उस समय शांति का राग ना अलापे और मजबूती से नेस्तनाबूत करना है लेकिन अब आगे बढ़ चुके तो पश्चिम से शर्म न हो।

-जे आर गुर्जर

सहायक आचार्य समाजशास्त्र

राजकीय महाविद्यालय आसींद भीलवाड़ा