मोहन बाबू बरामदे में बेचैनी से चहल कदमी कर रहे थे आज विवेक के इंटरव्यू का नतीजा आने वाला था। यद्यपि विवेक उनका अपना बेटा नहीं था परंतु वे उसे अपने बेटे की  तरह ही स्नेह करते थे। उन्हें बहुत उम्मीदें थी उससे.. तभी सामने से विवेक दौड़ता हुआ  आया और मोहन बाबू को प्रणाम करके बोला बाबूजी आपकी  मेहनत सफल हो गई.. मेरा  civil service में सिलेक्शन हो गया .. यही सुनने के लिए तो  मोहन बाबू के कान तरस रहे थे ।खुशी से उन्होंने विवेक  को गले से लगाते  हुए कहा बेटा मेरी नहीं तेरी मेहनत सफल हो गई.. मुझे पता है तुम ने दिन रात मेहनत की है । फिर  वे बगल वाले घर में चड्ढा साहब के यहां पहुंचे जहाँ सर्वेंट क्वार्टर में उनका माली मंगलू यानी विवेक का पिता रहता था वे खुशी के मारे दरवाजे के बाहर से ही चिल्लाते हुए बोले मंगलू देख तो ...अब तुम कोई साधारण आदमी नहीं रहा रे .. अब तो तू अधिकारी का बाप बन गया है...  यह सुनकर मंगलू बाहर आते हुए अश्रुपूरित नेत्रों से बोला- बाबूजी यह सब आप ही की किरपा है नहीं तो आज भूखन मर गए होते हम दोनों बाप बेटे। मंगलू को याद हो आया वह दिन जब आज से बीस बरस  पहले वह गांव के बाहर अपने बेटे के साथ सड़क के किनारे बैठ कर भीख मांगा करता था मोहन बाबू रोज वहां से स्कूल पढाऩे जाते । तब मंगलू के पैर में बहुत बड़ा सा जख्म था जिससे गंध भी आती थी उस समय विवेक की उम्र कोई छह सात बरस की रही होगी जो भी वहां से निकलता मंगलू को देखकर घृणा से मुंह में कपड़ा रख कर निकल जाता। ना जाने क्यो  मोहन बाबू मंगलू और उसके बेटे की सहायता करने से स्वयं को रोक ना सके। हालांकि उनके पास कोई बहुत पैसा नहीं था एक साधारण स्कूल मास्टर ही थे । परंतु किसी की मदद करने के लिए धन से अधिक आवश्यकता इच्छाशक्ति की होती है। आखिर एक दिन वे मंगलू को लेकर शहर के  सरकारी अस्पताल  पहुंचे और अपने कुछ जानने वालों से उसकी डॉक्टर से उसकी सिफारिश भी करवा दी कि बेचारा गरीब आदमी है अगर इसका निशुल्क अच्छा इलाज हो जाए तो  बच जाएगा । 2 महीने अस्पताल में रहने के बाद मंगलू की जान तो बच गई पर उसके पैर में सड़न पैदा होने के कारण उसका एक पैर काटना पड़ा । इस बीच मोहन बाबू बराबर विवेक के खाने पीने का इंतजाम करते रहे। हालांकि उनकी पत्नी इस बात पर नाराज भी होती कि यहां अपने लिए  तो पूर पड़ता  नहीं है और चले हैं दाता बनने ..पर मोहन बाबू शांति से उनके तानों को सुन लेते बस। अपने पड़ोस वाले बंगले में रहने वाले चड्ढा जी से जो  एक धनी व्यक्ति थे  मोहन बाबू ने मंगलू के काम के लिए बात की वो एक भले आदमी थे और उन्होंने मंगलू को  माली के तौर पर रख लिया । मोहन बाबू ने गौर किया था कि  विवेक अक्सर स्कूल जाते बच्चों को हसरत भरी  निगाह से देखा करता था। उन्होंने  उसके अंदर छिपे हीरे को पहचान लिया और उसकी पढ़ाई लिखाई की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली ।और तब से लेकर आज तक जितना मंगलू से बन पाता वह करता शेष उसकी पढ़ाई की सारी व्यवस्था मोहन बाबू करते उन्होंने विवेक के अंदर छुपे हुए उस हीरे  को पहचान लिया था जो आगे चलकर अपनी चमक से दुनिया को चकाचौंध करने वाला था ।बस उस हीरे को एक जौहरी की तलाश थी जो मोहन बाबू के रूप में उसे मिल गया था । और आज इस सफलता के बाद विवेक ने यह सिद्ध कर दिया था कि मोहन बाबू की पारखी नजर एकदम सही थी। सच ही कहते हैं हीरे की परख जोहरी को ही होती है।

-सोनिया सिंह (बांदा) यु,पी