विश्व परिवार दिवस-15 मई 

"वसुधैव कुटुंबकम" के आदर्श वाक्य को आधार मानकर  अपनी सामाजिक व्यवस्था को संचालित करने वाले हमारे देश भारत में परिवार नामक संस्था का प्राचीन काल से ही विशेष महत्व रहा है। जो देश पूरी पृथ्वी को ही अपने परिवार की दृष्टि से देखता हो वहां  परिवार की महत्ता स्वतः ही  सिद्ध हो जाती है। परिवार किसी भी समाज या राष्ट्र के निर्माण की मूलभूत इकाई है। परिवार की आवश्यकता व महत्व को दृष्टिगत रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1993 में संकल्प ए/ आर डी एस/ 45 / 237 के साथ आधिकारिक तौर पर इस दिवस को मनाने की घोषणा की। जिसका प्रतीक चिन्ह है- एक हरे गोलाकार चित्र में लाल रंग की छवि। जिसमें एक घर और एक दिल शामिल है। जो यह प्रदर्शित करता है कि परिवार किसी भी समाज का केंद्रीय हिस्सा है । जो सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए एक समर्थन व घर प्रदान करता है। विश्व परिवार दिवस के आयोजन की आवश्यकता वर्तमान युग में अत्यंत तर्कसंगत है। यह आधुनिक समय में लोगों के बीच परिवारों के महत्व के प्रति जागरूकता पैदा करता है। विश्व के सभी देश इस दिवस को अपनी अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनुसार मनाते हैं । भारत में भी इस दिवस को अत्यंत उत्साह के साथ मनाया जाता है। आज के दिन यथासंभव परिवार के सभी सदस्य आपस में मिलजुल कर आयोजन रखते हैं तथा साथ में समय व्यतीत करते हैं । समय के साथ परिवार के स्वरूप में प्राचीन काल की अपेक्षा अनेक परिवर्तन आए ,परंतु अभी भी हम परिवार की महत्ता व आवश्यकता को स्वीकार करते हैं। प्राचीन काल में परिवार का स्वरूप संयुक्त परिवार के रूप में ही होता था। जहां कई पीढ़ियों के लोग एक साथ एक छत के नीचे रहते थे । बदलते सामाजिक परिवेश तथा बदलती आवश्यकताओं के चलते संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवारों ने ले लिया। संकुचित मानसिकता,उपभोक्तावादी संस्कृति, अपरिपक्वता ,व्यक्तिगत आकांक्षा,स्वकेंद्रित विचार, तथा सामंजस्य की क्षमता में कमी के कारण संयुक्त परिवार की परंपरा आज छिन्न-भिन्न हो गई है ।परिवार का यह रूप अब यदा-कदा गांवों में ही देखने को मिलता है। विश्व भर में एकल परिवार की अंधी दौड़ ने भारत को भी प्रभावित किया है। गांव से रोजगार की तलाश में शहर को भागता मजदूर वर्ग समस्त परिवार को शहर ले जाने में सक्षम नहीं है, जिससे संयुक्त परिवारों का विखँडन हुआ । समाज का दुखद पहलू यह है कि अपनी स्वतंत्रता व आधुनिकता को अधिक महत्व देते हुए अब युवा वर्ग संयुक्त परिवार तो दूर अपने माता-पिता के साथ रहने में भी अपनी स्वतंत्रता का हनन महसूस करता है। देश में "ओल्ड एज होम" की बढ़ती संख्या  परिवारों को बचाने के लिए एक स्वस्थ सामाजिक परिपेक्ष की नितांत आवश्यकता की ओर इंगित करती है। एकल परिवारों का ही दुष्परिणाम है - वर्तमान समय में बढ़ते हुए बाल व किशोर अपराध। इस उपभोक्तावादी युग में जहां माता-पिता दोनों ही कामकाजी हो वहां एकल परिवार में बच्चे दिन भर घर में अकेले रहना असुरक्षा  तनाव  तथा अनेक मानसिक विकृतियों का कारण बनता है। ऐसे में बुजुर्ग माता-पिता का साया उनके बच्चों को के लिए वरदान की तरह होता है  जिनके साए में बच्चा श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की शिक्षा लेता है। साथ ही वे  बुजुर्ग माता-पिता तनाव और अवसाद से बच जाते हैं जिसका  उन्हें अक्सर  बुढ़ापे के एकांत जीवन में सामना करना पडता है। जिन माता-पिता ने हमारे पालन-पोषण में सर्वस्व त्याग कर दिया वृद्धावस्था में उन्हें अकेले छोड़ देना संबंधों की  दृष्टि में ही नहीं मानवता की दृष्टि से भी एक क्रूर अपराध है । संयुक्त परिवारों की इस परंपरा को यदि समय रहते नहीं बचाया गया तो हमारी आने वाली पीढ़ी ज्ञान संपन्न होने के बाद भी दिशाहीन होकर विकृतियों में फंस कर अपना जीवन बर्बाद कर लेगी।  परिवार नाम है एक ऐसी सुरक्षा का जहां पर एक बच्चा अपने बड़ों से जीवन मूल्यों की शिक्षा लेकर अपने भविष्य का निर्माण करता है, जहां युवा वर्ग जीवन की समस्त  समस्याओ और उलझन से लड़ने में स्वयं को सक्षम महसूस करता है, तथा बुजुर्ग भी बच्चों और परिवार को बीच में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते हैं। परिवार का निर्माण मात्र कुछ लोगों के साथ रहने से ही नहीं हो जाता अपितु एक दूसरे के प्रति प्रेम, विश्वास, सहयोग की अटूट बंधन से परिवार बनता है। हमारा कर्तव्य है कि हम इस की गरिमा को बनाए रखें। अधिकारों और कर्तव्यों का समुचित तालमेल तथा परस्पर प्रेम की भावना इसमें  सहायक होगी। वर्तमान समय में पूरे विश्व में कोविड -19 नामक बीमारी  उत्पन्न परिस्थितियां सहायक बन रही हैं हमें परिवार की महत्ता का एहसास दिलाने में ।आज जब बाहरी दुनिया से हमारा संपर्क कट  सा गया है तब परिवार ही है जो इस मुश्किल समय में हमें एकजुट होकर संघर्ष की शक्ति देता है। अपनी ऐसी प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखते हुए हम एक मानसिक रूप से स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं। इसीलिए कहा भी गया है कि परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला है।


-सोनिया सिंह

(बाँदा, उत्तरप्रदेश)