श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दो ‘बारह माहा’ बाणियां दर्ज हैं, एक तुखारी राग में श्री गुरु नानक देव जी की और दूसरी माझ राग में श्री गुरु अरजन देव जी की। इस लोकप्रिय काव्य-रूप में गुरु अरजन देव जी ने मानव-जीवन के बहुत अहम विषय को छुआ है। गुरु साहिब के अनुसार मानव-जीवन का केवल गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआएक ही लक्ष्य है- 

परमेश्वर से मिलन। पंचम पातशाह राग आसा में इसे इस प्रकार बयान करते हैं-  

भई परापति मानुख देहुरीआ।। 

गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ।।

गुरु साहिब हमें समझाते हैं, तुम्हें यह सुंदर मानव शरीर मिला है, परमेश्वर को मिलने का तुम्हारे लिए यही मौका है। 

जीवात्मा अपने मूल (परमात्मा) से टूटकर उसी तरह मुरझाई हुई अनुभव करती है, जैसे पानी के बिना वनस्पति मुरझा जाती है और उसे फल नहीं लगता। जिस जीवात्मा को ज्ञान हो जाता है, वह प्रभु से मिलने के लिए तरसती है। इस मिलन के लिए हर संभव प्रयास करती है। प्रभु मिलन की तड़प बहुत तीव्र हो जाती है, जो अपने प्रभु-प्रियतम के आगे अरदास, विनती, प्रार्थना के रूप में प्रकट होती है।

इस बाणी की भूमिका में गुरु साहिब जीवात्मा के प्रभु से वियोग का कारण उसके पूर्व कर्मों को ही बताते हैं- 

किरति करम के वीछुड़े करि किरपा मेलहु राम।। 

यानी, हे प्रभु! हम अपने कर्मों की कमाई के अनुसार (तुझसे) बिछड़े हुए हैं, मेहर करके हमें अपने साथ मिलाओ। इस बाणी का सार-तत्व इस छोटी-सी भूमिका में समाया हुआ है कि जीवात्मा प्रभु-चरणों में पुन: ध्यान जोड़ कर उसकी कृपा की पात्र बनकर उसके साथ मिल सकती है और जीवन प्राप्त कर सकती है। 

गुरु साहिब फरमान करते हैं कि केवल उन जीवों का ही संसार में आना सफल है, जिन्होंने प्रभु को पाने का लक्ष्य पूरा कर लिया- 

जिनि पाइआ प्रभु आपणा आए तिसहि गणा।। 

प्रभु प्राप्ति का आसान मार्ग नाम-सिमरन बताते हुए प्रभु के आगे गुरु जी याचना करते हैं- नानक की बेनंतीआ कर किरपा दीजै नामु।। 

सच्चे नाम की चिंगारी सब तरह के भ्रम एवं अज्ञान का विनाश करते हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार को जलाकर राख कर देती है और जीवात्मा को निर्मलता प्रदान करती है। गुरु फरमान है-

कूड़ गए दुबिधा नसी पूरन सचि भरे।।

पारब्रहमु प्रभु सेवदे मन अंदरि एकु धरे।।

गुरु साहिब प्रभु प्राप्ति के लिए संसार के त्याग पर जोर नहीं देते, बल्कि जीव को आवश्यकता से अधिक मोह, माया, सांसारिकता त्यागने का उपदेश देते हैं। संसार में गृहस्थ फर्ज निभाते हुए, प्रभु-नाम द्वारा प्रभु-चरणों से जुड़ कर, साधसंगत और निष्काम सेवा द्वारा अपने अहं की मैल धोकर मन के भीतर प्रभु से मिलन का मार्ग दर्शाते हैं। जीव अपने अंत:करण को स्वच्छ करके ही प्रभु का दीदार कर सकता है।