सनातन धर्म में यज्ञ का काफी महत्व बताया गया है। युद्ध जीतना हो या कोई मनोकामना की अर्जी भगवान तक पहुंचानी हो राजा-महाराज और ऋषि-मुनि यज्ञ करावाया करते थे। अयोध्या के राजा दशरथ ने भी अपने पुत्रों के लिए यज्ञ करवाया था।

यज्ञ के अपने कई महत्व होते हैं। अलग-अलग काज के लिए अलग-अलग यज्ञ करवाए जाते थे। एक ऐसा ही यज्ञ था जिसे राजा दशरथ ने अपने पुत्रों की प्राप्ति के लिए करवाया था। जब सभी देवता एक साथ भगवान विष्णु के पास रावण के बढ़ते उदंड की शिकायत लेकर गए तो विष्णु ने कहा कि अब वो रावण के वध के लिए धरती पर अवतार लेंगे। उधर, अयोध्या के राजा इस बात से चिंतित थे कि क्या उनका वंश आगे नहीं बढ़ेगा? क्या अयोध्या को उसका उत्ताराधिकारी नहीं मिलेगा?

ऐसे में राजा दशरथ को बताया गया कि वो पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टी यज्ञ करवाएं। उन्हें ये भी बताया गया कि ये यज्ञ सिर्फ और सिर्फ अथर्वेद के पूर्ण ज्ञाता ऋषि श्रृंग मुनि ही करवा सकते हैं। माना जाता है कि मखौड़ा धाम ही वह सौभाग्यशाली स्थान है, जहां राजा दशरथ ने पुत्रकामेष्टी यज्ञ कराया था।

मखौड़ा धाम बस्ती जिले में हर्रैया तहसील के सबसे प्राचीन स्थानों में से एक है। ऐसा कहा जाता है कि दशरथ और कौशल्या की बेटी जिनका नाम शांता है, जो ऋषिश्रिंग की पत्नी थीं। ऐसा माना जाता है कि राजा दशरथ ऋषि श्रृंग के आश्रम में अयोध्या के राजा नहीं बल्कि एक साधारण व्यक्ति बनकर गए थे। क्योंकि उनका मानना था कि वो ऋषि से भिक्षा मांगने जा रहे हैं। इसीलिए राजा दशरथ नंगे पांव, साधारण कपड़ों में ऋषि के आश्रम गए और उनके यज्ञ करवाने का आग्रह किया।

यज्ञ के दौरान अग्नि के निकट यज्ञ के निष्कर्ष, यज्ञकुंडा से बाहर खीर का बर्तन निकला और ऋषि श्रृंग ने दशरथ को खीर का बर्तन दिया, जिससे वह उसे अपनी रानियों के बीच वितरित करने की सलाह दी। कौशल्या ने आधा खीर खा लिया, सुमित्रा ने इसका एक चौथाई खा लिया। कैकेयी ने कुछ खीर खा लिया और और शेष को सुमित्रा को वापस भेज दिया, जिसने खीर को दूसरी बार खाया।

कई दिनों तक चले इस यज्ञ के फलस्वरूप नवमी तिथि को राजा की तीनों रानियों कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने पुत्रों को जन्म दिया। चूंकि कौशल्या ने राम को जन्म देने वाले सबसे बड़े हिस्से का उपभोग किया था। कैकेयी ने भरत को जन्म दिया। सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया।