परजीवी शब्द  सम्भवतः बायोलॉजी  अर्थात जीव विज्ञान के सम्बंधित शब्द होना चाहिए? यह शब्द राजनीति में समाहित कर लिया गया। राजनीति में अपने विरोधियों पर कटाक्ष करने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया गया?
परजीवी को आँग्ल भाषा में शब्द है, Parasitc कहतें हैं।जो दूसरों के जीव पर जीवित रहतें हैं।यह लक्षण पशु पक्षियों और और वन्य प्राणियों में पाएं जातें हैं।
मानवों में नरभक्षी होतें होंगे?यह अनुसंधान का विषय है?
यदि दूसरों पर आश्रित होकर जीवित रहने के लिए परजीवी शब्द का प्रयोग करें तो मानवों में भिखारी ही इस परिभाषा में आ सकतें हैं।
परजीवी शब्द का राजनीतिकरण किया जाए तो जो समुह सिर्फ और सिर्फ दूसरों के चंदे पर ही पलते बढतें है, वे भी परजीवी की परिभाषा में आ सकतें हैं।इस तरह के बहुत से संगठन हो सकतें हैं।कुछ तो शतक बनाने के नजदीक है।लेकिन मानव के लिए परजीवी शब्द का प्रयोग कतई ठीक नहीं है।मानव तो अंततः मानव है।
सबसे बड़ा Parasitic अर्थात परजीवी होता है, बिच्छू।बिच्छू का जन्म बहुत ही विचित्र तरीके से होता है।मादा बिच्छू एक साथ लगभह सौ बच्चों को जन्म देती है।एक साथ इतने बच्चें मादा बिच्छू के पेट से बाहर आते हैं,और अपनी माँ मतलब मादा बिच्छू को ही खातें हैं,और बड़े होतें हैं।एकसाथ सौ बच्चे द्वापरयुग की याद दिलाते हैं।द्वापरयुग में कौरव सौ भाई थे।शायद धृतराष्ट्र,पुरुष प्रधान मानसिकता के पक्षधर थे?द्वापरयुग ही महाभारत सम्पन्न हुआ है। महाभारत में इन सभी भाइयों के विवाह का कोई जिक्र नहीं है।
शायद सभी अविवाहित ही थे,या धृतराष्ट्र ने इन्हें ब्रह्मचारी रहने की शिक्षा दी थी?इसका उल्लेख महाभारत की पूर्ण कथा में कहीं भी पढ़ने सुनने को नहीं मिलता है।
वैसे अविवाहित और ब्रह्मचर्य में बहुत अंतर है,ऐसा भारत के कद्दावर नेता ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है।यह नेता दिवंगत हो गए हैं।यह बहुत ही अलग विषय है।
बहरहाल मुद्दा है परजीवी का?कलयुग में बिच्छुओं का जन्म स्वयं अपनी माँ को खाकर होता है।
अपनी  माँ को खा कर बड़े होना बिच्छू का प्राकृतिक स्वभाव है।
ऐसा विचित्र जंतु समूची दुनियां  शायद ही कोई दूसरा हो सकता है।
बिच्छुओं के जन्म की प्रक्रिया, विचित्र किंतु सत्य है। यह सिलसिला कबतक बिच्छू पैदा होते रहेंगे,अनवरत चलता रहेगा।
स्वयं की माँ को खाकर ही पलने बढ़ने वाला जंतु बिच्छू ही हो सकता हैं।
परजीवी होने का इससे बड़ा शायद ही कोई दूसरा उदाहरण हो।
बिच्छू काटता नहीं है,डंक मरता है।बिच्छू के डंक की मार का दर्द असहनशील होता है।बिच्छू जिस किसी को डंक मारता है,वह तिलमिला जाता है।
बिच्छुओं की बहुतसी प्रजातियां होती है।सभी बिच्छू डंक मारते हैं।
बिच्छू स्वयं की माँ को खाकर पलते बढतें हैं।अन्य बिच्छुओं से चंदा मांग कर अपने समूह का विस्तार नहीं करतें हैं।
बिच्छू के डंक लगने के निम्नलिखित व इनके अलावा और भी कई लक्षण हो सकते हैं :
पूरे शरीर में सुनापन
साँस लेने में कठिनाई निगलने में कठिनाई जीभ में सूजन होना और मुख में अत्यधिक लार आना
जी मचलाना और उल्टी होना
वाणी का अस्पष्ट होना बेचैनी होना,दौरे पड़ना धुंधला दिखाई देना मांसपेशियों का अचानक फड़कना आँखों का फिरना
अल्प रक्तचाप हृदय की धड़कन का असामान्य रूप से धीमा पड़ना अनियंत्रित मल या मूत्र का त्याग होना घबराहट होना आदि लक्षण होतें हैं।
बिच्छुओं के आकार भी प्रत्येक जगह के भौगोलिक वातावरण के अनुसार होतें हैं।
जो भी हो परजीवी जंतु का बिच्छू  ही एक सटीक उदाहरण है।

-शशिकांत गुप्ते इंदौर