निर्मल शीतल अविरल 
ध्वनि करती वो कल कल। 
प्रिय से मिलने को व्याकुल 
संयोग प्रतीक्षा से आकुल। 
चली जा रही अलमस्त अल्हड़ सी 
कुछ इतराती इठलाती सी
 कभी कूचालें  भरती हिरनी सी 
कभी लजाती नवयौवना तरुणी सी
 मचलती कहीं बाल रूप सी 
शांत कहीं सांझ की धूप सी
 कहीं उफनती कामकला सी
 स्निग्ध कही ऋषि बाला सी
चली जा रही झर झर निर्झर
 सरिता जा रही खोजने

अपने हिस्से का सागर.....

-सोनिया सिंह बाँदा (यु पी)

(चित्र -फेसबुक से साभार)