मनुष्य जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए भौतिक पदार्थों की परम आवश्यकता है। बिना इन पदार्थों के भोग के मनुष्य जीवन की कल्पना करना संभव नहीं है। भौतिक सामग्री का उपयोग हम किस भावना से कर रहे हैं, यह समझना बहुत जरूरी है। हमारी आध्यात्मिक विरासत, वेदों में भी मनुष्य जीवन को सम्यक रूप से चलाने के लिए भोग और त्याग का अद्भुत समन्वय स्थापित करते हुए कहा गया है कि संसार की समस्त वस्तुओं का प्रयोग त्याग भाव से करो, अर्थात त्याग करते हुए भोगने का सूत्र। त्याग और भोग साथ-साथ। त्यागी तो योगी होता है और भोगी संसारी। वास्तव में भोग और योग दोनों हमारे भीतर ही हैं। आवश्यकता है दोनों में संतुलन बैठाने की। हम त्याग भी करते हैं और भोग भी, लेकिन हम कितना त्याग करते हैं और कितना भोग, यही बड़ा प्रश्न है। प्रत्येक वस्तु का उपभोग करते हुए हमारी भावना त्याग की होनी चाहिए। जितनी भौतिक सामग्री से हमारा जीवन सम्यक रूप से चले, उतनी का ही भोग करो। यही आनंद का नैतिक सूत्र है। संसार में रहते हुए संपूर्ण भौतिक सामग्री का संग्रह करो, परंतु दूसरों के हितों को देखते हुए त्याग की भावना को आत्मसात करते हुए उसका प्रयोग करो। हमारी ऋषि परंपरा भी इसी सिद्धांत की अनुगामी रही है कि भोग उतना ही होना चाहिए जितना जीवन के लिए जरूरी होता है। मात्र भोगों में आसक्त हो जाना राक्षस प्रवृत्ति है। भोग जब तक त्याग के दायरे में रहता है, तब तक वह मनुष्य के लिए हितकर होता है। जब त्याग की भावना समाप्त हो जाती है, उसी समय मनुष्य की लालसा विशाल रूप ले लेती है, जिसका कोई अंत नहीं है। भोग की यही भावना संपूर्ण विश्व के कल्याण व स्वयं मनुष्य के आनंद में बाधक बनती है। अत्यधिक भोगने की प्रवृत्ति मनुष्य के जीवन को अधोगति की ओर ले जाती है। इसके विपरीत त्याग की भावना मानसिक आनंद, शांति की प्राप्ति करवाती है। त्यागपूर्वक भोग करने वाला मनुष्य अपने जीवन से सदा संतुष्ट रहता है। विवेकहीन होकर केवल भोगी बनना आसुरी प्रवृत्ति है। त्यागपूर्वक भोगना दैवी प्रवृत्ति है। 

यजुर्वेद के ईशोपनिषद में वर्णित है कि ईश्वर इस जगत के कण-कण में व्याप्त है, जो भी जड़ और चेतन पदार्थ हैं उन सबका स्वामी ईश्वर ही है। इसलिए संसार के समस्त भौतिक पदार्थों का त्याग भाव से उपभोग करो। किसी दूसरे के धन का लालच मत करो। आध्यात्मिक ग्रंथ वेद में भी मनुष्य जीवन को उन्नत बनाने के लिए समस्त पदार्थों का त्यागपूर्वक भोग करने का संदेश दिया गया है। इस संसार की प्रत्येक वस्तु व पदार्थ पर परमात्मा का अधिकार है। संपूर्ण भौतिक संपदा का स्वामी वह ईश्वर ही है, इसलिए उसकी संपदा को त्याग भाव से भोगने वाला मनुष्य ही सुखी रहता है। कभी भी भोगमयी प्रवृत्ति को अंतःकरण में प्रबल नहीं होने देना चाहिए। भोग मनुष्य को बंधन में बांधता है और त्याग मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करता है। भोगों में अत्यधिक संलिप्तता मनुष्य की विचारधारा को स्वार्थी व क्षुद्र बना देती है। 

भर्तृहरि ने भोगवादी प्रवृत्ति का अपने वैराग्य शतक ग्रंथ में मार्मिक चित्रण करते हुए कहा है कि विषयों को हमने नहीं भोगा, किन्तु विषयों ने हमारा भुगतान कर दिया। भोग की प्रवृति का अंत न हुआ, हमारा ही अंत हो गया। हमने तप को नहीं तपा, अपितु सांसारिक तापों ने हमें ही तपा डाला। काल या समय का अंत न आया, किंतु हमारा ही अंत आ गया। हमारी तृष्णा बूढ़ी और कमजोर न हुई, किन्तु हम निर्बल और कमजोर हो गए। भोगी व्यक्ति केवल अपने उदर पूर्ति तक सीमित रहता है। त्याग ईश्वरीय मार्ग को प्रशस्त करता है। भोग व त्याग का यही संतुलन मानव जीवन को शाश्वत शांति की प्राप्ति में सहायक होता है। भोग व त्याग का समन्वय ही संपूर्ण विश्व को शांति पथ की ओर अग्रसर  करता है। 

रविन्द्रनाथ टैगोर ने भी अपने विश्लेषण में कहा है कि भोग और त्याग का सम्यक संतुलन ही मनुष्य को सांसारिक सुख एवं आत्मिक आनंद की प्राप्ति करवाता है। हमारी वैदिक ऋषि संस्कृति भी भोग और त्याग के संतुलन का उपदेश देती है।