नींद में सुकुमा एक अजीब सी बैचेनी से भर गयी। अचकचा कर उसने आँखें खोली तो कोठरी के छोटे से झरोखे पर दो आँखें खुद को घूरती हुई दिखाई दीं। वह हड़बड़ा कर उठ बैठी नींद में सरक आये आँचल को टटोल कर सीने को ढांपा फिर आँचल का सिरा ढूँढ  कर सिर पर पल्लू लेने का जतन करने लगी। तब तक एक साया सा वहाँ से सरक गया और झरोखे से आती धूप उसकी गोद में पड़ी। पसीने से लथपथ आँचल सीने से थामे वह डर के मारे काठ सी बन गयी एक बार फिर झरोखे की ओर देखा वहाँ अब कोई नहीं था। वह दौड़ कर झरोखे तक आयी और पंजों के बल खड़े होकर सलाखें पकड़ बाहर देखने लगी। दूर बाड़े में बाहर जाते किसी की पीठ दिखाई दी लम्बा पीला कुर्ता और लहरिया वाली पगड़ी दिखी। उसने फिर दायें बाँये देखा, बाँए कोने में छप्पर के नीचे भैसे पगुरा रही थीं। दोपहर की पीली धूप में आँगन के पेड़ त्रस्त खड़े थे। पेड़ के नीचे बिछी रहने वाली खाट भी वहाँ नहीं थी मतलब अम्माँ  भी अपनी कोठरी में थीं। दायें तरफ से आँगन की तरफ मुड़ी कोठरी में उसे दो आँखें खुद को ताकती नज़र आयीं और नज़रें मिलते ही वे वहाँ से ओझल हो गयीं। 
 
     सुकुमा सलाखें छोड़ कर धम्म से बैठ गयी।  उसने दोनों हाथों से सिर थाम लिया। भाभी झरोखे से उसे क्यों देख रही थीं? क्या उन्हें पता था कि वह बाहर झाँक रही है, तो उन्हें ये भी पता होगा कि उसकी कोठरी में कौन झाँक रहा था? कौन था वह? लम्बा पीला कुर्ता और लहरिया पगड़ी वो तो वो तो ... हे भगवान् उसका कंठ सूख गया, वह पसीने से तरबतर हो गयी, उसका मन हुआ वह बुक्का फाड़ कर रो दे लेकिन आँचल मुँह में दबा कर उसने आवाज़ को रौंदा। आँसू गालों से बहते हुए कोठारी के कच्चे फर्श में समा गए। वे आँसू भी धरती का सीना न पसीज सके। सुकुमा रोती रही दोनों हाथों की मुठ्ठियों से अपना सिर पीटती रही। उसके दुःख से चटकीली धूप भी जर्द हो चली थी। अम्माँ की चाय की पुकार उसके दुःख पर भारी थी, उसने उठ कर आँचल सँवारा और कोठरी के दरवाज़े की साँकल खोल कर बाहर आ गयी। 
 
    धूप बाड़े से विदा ले रही थी अम्माँ की खटिया पेड़ के नीचे लग गयी थी। उसे देखते ही अम्माँ का रौबदार स्वर गूँजा " लाड़ी दिन में भी ऐसा सोया जाए है कि टेम  का ध्यान ही ना रहे ? चाय चढावो तुम्हारे बाबू साब आने वाले हैं।" 
 
    वह रसोई की तरफ मुड़ी तब तक बाबू साब ने बाड़े में प्रवेश किया। वह तेज़ कदमों से भागी बाबू साब का शाम की चाय का समय निश्चित है, उसमे देर सवेर उन्हें पसंद नहीं। वे कहते कुछ नहीं हैं लेकिन फिर वे कुछ भी नहीं कहते यही उनकी नाराज़गी की निशानी है लेकिन फिर अम्माँ बहुत कुछ कह जाती हैं। रसोई में भाभी चाय छान रही थीं देखकर उसकी जान में जान आयी। 
 
     "बाबू साब आ गए हैं" कह कर वह आँगन में मुँह हाथ धोने चली गयी। आँसुओं के निशान उँगलियों से रगड़ रगड़ कर छुड़ा दिए पर दिल में जो डर समा गया था उससे कैसे पीछा छुड़ाए, सुकुमा नहीं जानती थी। 
 
    चाय पीते चोर नज़रों से भाभी को देखा वे नज़रें झुकाये चाय सुडक रहीं थीं। शांत निर्विकार सा चेहरा वह सोचने लगी भाभी को उसने कभी हँसते मुस्कुराते नहीं देखा ना ही कभी बातें करते देखा। वैसे भी घर में कौन किससे बातें करता है, अम्माँ दिन भर हुक्म चलाने को बोलती हैं, वह और भाभी हुक्म की तामील करने को हाँ हूँ करती हैं। 
    
    भाभी जो उसकी जिठानी हैं, उससे शायद एक दो वर्ष ही बड़ी होंगी। उनकी शादी को तीन वर्ष हो गए लेकिन अब तक गोद नहीं भरी, इसी बात के जहर बुझे तीर अम्माँ उन पर छोड़ा करती हैं, और वे अपनी लहुलुहान आत्मा पलकों तले छुपाये चुपचाप काम में लगी रहती हैं। जब सुकुमा ब्याह कर आयी थी तभी उसने भाभी को गहने जेवर पहने देखा था उसके बाद से उन्हें सजते संवरते नहीं देखा। सुकुमा को श्रृंगार का बहुत शौक था नित नए गहने पहन कर वह पति को रिझाती थी, सिर के बोर से पैजनी तक की तारीफ उससे करवाती थी, कब आधी रात बीत जाती दोनों को पता ही नहीं चलता। उसकी खनकदार हँसी कोठरी से बाहर न चली जाए इसके लिए रणबीर बार बार आगाह करता और वह उसके चौड़े सीने में मुँह छुपा कर उसकी बलिष्ठ बाँहों में बंध जाती। हँसने से ज्यादा हँसी दबाने में उसकी साँस फूल जाती। 
 
    एक मुस्कान उसके चेहरे पर फ़ैल गयी। चाय बशी में ही ठंडी हो गयी थी। भाभी उसे अपलक देख रहीं थीं। वह ऐसे अचकचा गयी मानों चोरी पकड़ी गयी हो। भाभी चाय के बर्तन समेट कर बाहर चली गयीं, ठंडी चाय कप में डाल कर सुकुमा एक साँस में पी गयी। खाली कप बशी में रखते उसे खाली कप सी अपनी जिंदगी का भान हुआ। 
 
    भाभी दाल निकाल कर चूल्हे पर चढाने की तैयारी करने लगीं, सुकुमा बाहर से जूठे कप बशी उठा लाई, फिर भैसों को चारा पानी देने चली गयी। शाम ख़ामोशी से ढलने लगी, बाड़े में लगा पीला बल्ब पूरी ताकत लगा कर भी उजियारा पैदा नहीं कर पा रहा था। सुकुमा को लगा इस घर में सबकी जिंदगी भी ऐसी ही धुंधलाती सी है शाम की उदास ख़ामोशी में डूबी सी। 
 
    भोजन बनाने खाने तक भी उसके और भाभी के बीच कोई बात नहीं हुई। कई बार उसने उन्हें खुद को देखता हुआ पाया तो कई बार वह भाभी को ध्यान से देखती रही। सुकुमा को आश्चर्य होता वो इतनी खामोश क्यों रहती हैं? क्या भाई जी और इनके बीच प्यार नहीं है? या जीवन की एक कमी को इन्होने सभी प्राप्य से ऊपर स्थान दिया है। 
 
    भाई जी बाड़े में मुँह हाथ धो रहे थे, उनका पीला कुरता और लहरदार पगड़ी देख कर उसे दोपहर याद आ गयी। वह फिर सोच में पड़ गयी क्या झरोखे पर वह भाई जी थे? उसका दिल मानने को तैयार नहीं था लेकिन अगर वो नहीं थे तो फिर कौन था? घर में उस समय और तो कोई नहीं था। खेत के नौकर भी सुबह सुबह ही आकर चले गए थे तो फिर वह कौन था? 
 
     उस रात सुकुमा देर रात तक उस झरोखे पर टकटकी लगाए देखती रही लेकिन वहाँ कोई नहीं था। उसे आज रणवीर की बाँहों के सुरक्षा घेरे की बहुत याद आ रही थी। उसे अपने अकेलेपन की बेबसी पर जोर जोर से रोने का मन हो रहा था। उसने मुँह में आँचल ठूँस कर अपनी रुलाई को अन्दर दबाने की कोशिश की। 
 
     उसकी शादी को सात आठ महीने ही तो हुए थे। उस दिन रणवीर बहुत परेशान था बिलकुल चुप। सुकुमा ने उसे हँसाने की बहुत कोशिश की, अपने बालों की लट से उसके कानों में गुदगुदी की, उसके पसंद का गीत गुनगुनाया, अपना आँचल गिरा कर उस पर लुढ़क ही गयी थी वह, लेकिन रणवीर बुत बना बैठा रहा।  
 
     उसने बस इतना ही कहा कि "अब वह बचपना छोड़ दे और कमरे के बाहर ठीक से रहा करे पल्लू ठीक से रखा करे।" 
 
    "मैं तो पल्लू ठीक से ही रखे हूँ, काम करते कहीं इधर उधर हो जाये तो हो जाये, पर तुम ऐसा क्यों कह रहे हो? किसी ने कुछ कहा क्या? अम्माँ या बाबू साब ने कुछ कहा क्या?"
 
     "किसी के कहने से क्या होवे है? मैंने कहा न बस मेरी बात ध्यान रख। घर में ध्यान से रहा कर किसी को कुछ कहने करने का मौका न मिले।" इतना कह कर रणवीर ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया लेकिन वह गुमसुम ही रहा। 
 
     उस दिन के बाद कई बार वह बहुत परेशान दिखा लेकिन लाख पूछने पर भी उसने सुकुमा को कुछ नहीं बताया। झरोखे से चाँदनी छन कर आ रही थी। जब उसे और रणवीर को प्यार भरी चुहल करते, समय का भान नहीं रहता था तब ये चाँदनी ही उन्हें समय का एहसास कराती थी और रणवीर कहता "देख चाँद आधा आसमान पार कर आया अब सो जा, सुबह नींद न खुली तो अम्माँ तेरे सारे मायके वालों को याद करके कोसेंगी फिर मत रोइयो।"
 
     रणवीर परेशान क्यों रहने लगा था आखिर क्या कारण था? सुकुमा को कभी समझ नहीं आया। वह उठ कर झरोखे की सलाखें पकड़ कर बाड़े में फैली चाँदनी निहारने लगी। उसकी बड़ी इच्छा होती थी कि वह और रणवीर सारी रात इस चाँदनी में भीगते रहें। वह कहती भी थी, "सब सो गए हैं चलो न थोड़ी देर बाड़े में चलें और चाँदनी को हमारे प्यार का साक्षी बनायें।" 
 
      रणवीर मना  कर देता "तुझे मेरे प्यार पर भरोसा नहीं है जो किसी गवाह की जरुरत है।" 
 
    "हूँ तुम मर्दों का क्या भरोसा कहीं किसी और पर दिल आ गया तो ?" वह तुनक कर कहती। 
 
     रणवीर हँस देता, "अगर किसी पर दिल आ भी गया तो तेरा ये चाँद क्या कर लेगा, मुझसे लड़ने आएगा या तेरे आँसू पोंछने आयेगा ?" 
 
    सुकुमा तुनक जाती और वह उसे अपने बाहुपाश में बाँध उसके होंठों पर अपने प्यार की मोहर अंकित कर देता। "अरे पगली मेरा दिल तो तेरे पास है किसी और पर कैसे आ सकता है फिर तुझसे अच्छी कोई और है भी तो नहीं तू सबसे अच्छी है मेरी जान है तू।"
 
     रणवीर का तो नहीं आया लेकिन मौत का ही दिल रणवीर पर आ गया और वह बिना कुछ कहे सुने इस चाँदनी में उसे अकेले जलने के लिए छोड़ गया। 
 
     एक गहरी साँस लेकर वह सलाखें छोड़ कर पलटने लगी तभी उसने भाभी की कोठारी के झरोखे पर किसी को खड़ा देखा वह ठिठक कर वहाँ देखने लगी एक बार फिर नज़रें टकरायीं और वो आकृति वहाँ से हट गयी, वो भाभी ही थीं। 
 
     भाभी इतनी रात में झरोखे पर क्या कर रही हैं? अब तक सोयी नहीं? भाई जी तो घर पर ही है उन्होंने सबके साथ खाना खाया था फिर कहीं बाहर चले गए क्या ? गए भी तो अब तो आधी रात बीत गयी अब तक नहीं लौटे? तो क्या इसलिए भाभी इतनी चुप चुप उदास उदास रहती हैं? क्या भाई जी किसी और के साथ ....छी छी ये क्या सोच रही है वह ? 
 
     सुबह सुबह उसकी आँख खुली झरोखे पर से किसी साए को सरकते देखा उसने, वह हड़बड़ा कर उठ बैठी ये सच था या उसका भ्रम ? 
 
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      उसका मन होता रहा वह भाभी से पूछे क्या वे रात झरोखे पर खड़ी थीं ? क्या भाई जी घर पर नहीं थे ? लेकिन उनकी चुप्पी इतनी सघन थी कि उसमे सुकुमा के शब्द खो जाते थे। रणवीर के जाने के बाद सुकुमा किसी से बात करने को तरस जाती लेकिन भाभी का मौन उसके शब्दों को निगल जाता।  
 
     सुकुमा नहा कर कपड़े बदल रही थी, रसोई के पीछे आँगन के कोने में टाट की आड़ करके घर की औरतों के नहाने का इंतजाम किया गया था। उसे लगा कोई उसे घूर रहा है। उसने इधर उधर देखा तो एक साया सा सरकता नज़र आया वह डर गयी कौन हो सकता है ? 
 
     कपडे बदल कर लकड़ी लाने के बहाने वह भैसों के बाड़े से पीछे आँगन तक का चक्कर लगा आयी वहाँ कोई नहीं था। पूछे तो किससे पूछे ? उसने हिम्मत कर भाभी से पूछा "अभी पीछे आँगन में कोई आया था क्या?" 
 
     "नहीं तो क्यों?" भाभी ने पूछा .
 
    "बस ऐसे ही पूछा जब नहा रही थी तो ऐसा लगा आँगन में कोई है।" 
 
     भाभी चुप हो गयीं नज़रें नीची करके काम में लग गयीं। दिन भर काम करते निकल गया रात में थकी हारी लेटते ही उसकी आँख लग गयी। ऐसा लगा जैसे किसी ने कोठरी का दरवाज़ा भडभडा कर खोलने की कोशिश की वह चौंक कर उठ बैठी तभी झरोखे पर दो घूरती आँखें दिखीं नज़रें टकराते ही वे वहाँ से हट गयीं। आज उसे कोई शक नहीं रहा वे भाई जी ही थे। 
डर के मारे सुकुमा की घिग्घी बंध गयी। भाई जी ने उसकी कोठरी का दरवाज़ा खोलने की कोशिश क्यों की? वे झरोखे से उसे क्यों घूर रहे थे? क्या करे वो किससे कहे? अम्माँ से, भाभी से क्या वे उसका यकीन करेंगी ? कितनी अकेली है वह उसकी रुलाई फूट गयी। 
 
      उस दिन के बाद सुकुमा ने गौर किया कि आते जाते काम करते भाई जी की नज़र सुकुमा पर रहती है। उस दिन वह भैसों को चारा पानी दे रही थी, तभी भाई जी ने उसे पीछे से पकड़ लिया। उसकी रीढ़ की हड्डी तक कंपकंपा गयी वह गिड़गिडाने लगी  "भाई जी ये क्या कर रहे हो आप ? मैं हाथ जोड़ती हूँ छोड़ दो मुझे।"
 
     "ए छोरी ऐसे कैसे छोड़ दूँ कितने दिन से इस दिन का इंतजार कर रहा था। तूने बहुत तरसाया है।" उन्होंने उसे उठा कर घास के पुआल पर पटक दिया। 
 
     "सुकुमा ओ सुकुमा ", पीछे के आँगन से आवाज़ आई। "लकड़ी लाने में कितनी देर कर दी चूल्हा बुझ जायेगा।" आवाज़ पास आती जा रही थी, भाई जी तुरंत पलट कर बाड़े की ओर चले गए। सुकुमा ने खुद को जैसे तैसे संभाला और पीछे आँगन की तरफ भाग गयी। 
 
     उसे लगा भाभी जानबूझ उसे आवाज़ लगाते हुए आयीं थीं वो लकड़ी लाने तो गयी ही नहीं थी। वह गुमसुम सी बैठी रही भाभी अकेले रसोई करती रहीं बीच बीच में उस पर एक नज़र डाल लेतीं। खाना खाते समय भी भाभी खोयी सी बैठीं थी कौर हाथ में था और वे कहीं शून्य में ताक रहीं थीं। 
 
     "भाभी, उसने पुकारा तो ऐसे चौंक पड़ीं जैसे नींद से जगा दिया गया हो। "भाभी आज आप जानबूझ कर मुझे आवाज़ लगाते हुए आयीं थीं ना ?आपको पता था" उसके बाद के शब्द उसके गले में ही अटक गए। 
 
     "खाना खा छोटी, औरत जात को हर जगह सजग रहना पड़े है बस इतना ध्यान रखियो।"
 
     तो भाभी जानती हैं कि भाई जी मुझ पर बुरी नज़र रखे हैं। कौर हाथ में ही रखा रह गया। भाभी खाना ख़त्म करके उठ गयीं जाते जाते उससे कह गयीं  "खाना खा ले छोटी लड़ने के लिए ताकत चाहिए।" 
 
     उस दिन के बाद उसे पाने की भाई जी की कोशिशें तेज़ हो गयीं।  उस रात वह कोठरी की सांकल लगाने लगी तो देखा सांकल टूटी हुई है वह दरवाज़ा पकड़ कर घंटे भर वहीं खड़ी रही, जब उसने देखा सब सो गए हैं वह दरवाज़ा उड़का कर रसोई में घुस गयी। वह सारी रात उसने रसोई के दरवाजे से पीठ लगा कर बैठे बैठे काटी। 
 
     आधी रात में रसोई का दरवाज़ा खोलने की कोशिश हुई बाहर से भाईजी की दबी आवाज़ में गुर्राने की आवाज़ आयी  "देख छोटी ज्यादा नखरे ना दिखा दरवाज़ा खोल दे तू मेरे से बच ना सकेगी।" 
 
      वह थर थर कांपती दरवाज़ा थामे खड़ी रही। थोड़ी देर धमकियों के साथ देख लेने की चेतावनी और सन्नाटा छा गया लेकिन सुकुमा ने दरवाज़ा ना छोड़ा। 
 
       सुबह उसने अम्माँ से कहा "अम्माँ मेरी कोठरी की सांकल टूट गयी है ठीक करवा दो।"  खा जाने वाली नज़रों से उसे देखते अम्माँ ने बेरुखी से कहा -"हाँ हाँ करवा देंगे। "
 
     सुकुमा छटपटा कर रह गयी क्या करे, अम्माँ को भाईजी की हरकतों के बारे में बताये ? क्या वे उस पर विश्वास करेंगी ?जाने क्यों उसे लगा जैसे अम्माँ सब जानती हैं। ज़ाने क्यों उसे लगा कि उनसे कुछ कहना लिहाज़ के जर्जर झीने परदे को तार तार कर देना ही होगा,  ज़ाने इसके बाद सब खुल्लम खुल्ला ही हो जाये? वह चुपचाप वहाँ से हट गयी। 
 
      बाबू साब के सामने तो वह हाथ भर का घूँघट करती है। साल भर में उसे याद नहीं कि उसने कभी उनसे बात की हो। अम्मा के सामने बाबू साब से बात करना वो भी भाईजी के बारे में इतना साहस उसमे नहीं है।  
क्या करे वह? उसे लगा उसका दम घुट रहा है। अगर किसी को नहीं बताया, किसी से मदद न ली तो वह खुद को बचा नहीं पायेगी। क्या करे कहाँ जाए किससे मदद की गुहार करे।  
 
      खाना बनाते हुए उसने भाभी से कहा -"भाभी आप ही बताओ मैं क्या करूँ कैसे खुद को बचाऊँ ? भाभी कुछ नहीं बोली उसी तरह पलकें झुकाए रोटी सेंकती रहीं।  
 
     अपनी परेशानियों में सुकुमा खाने की थाली पर कौर हाथ में लिए बैठी रही , उससे खाया न गया जबकि भाभी यंत्रवत खाती रहीं। वैसे भी उनकी और सुकुमा के बीच सिर्फ काम की बातें ही होती थीं। यूँ उनमे कभी कोई खटपट नहीं हुई दोनों मिल जुल कर घर के काम निबटा लेती थीं। पहले सुकुमा को लगता था भाभी उसे पसंद नहीं करतीं। उसने रणबीर से कहा भी था "भाभी मुझसे बात नहीं करती।" 
 
     रणवीर ने कहा था "उनका स्वभाव ही ऐसा है वे चुप ही रहती हैं।  अम्मा की बातों से दुखी होकर और ज्यादा चुप हो गयी हैं लेकिन दिल की बहुत अच्छी हैं।" 
 
     ये याद करके सुकुमा की हिम्मत फिर बँधी उसने कहा "भाभी मैं क्या करूँ कैसे खुद को बचाऊँ ? कोठरी के दरवाज़े की सांकल टूटी हुई है।" उसने बिना भाई जी का नाम लिए रात का पूरा किस्सा उन्हें सुना दिया।  
वे चुपचाप खाते हुए सुनती रहीं।  
 
     अपनी बेबसी की छटपटाहट में उसका मन हुआ भाभी को जोर से झकझोर दे। उनसे पूछे भाभी बताओ मैं क्या करूँ, कैसे खुद को बचाऊँ? आप जानती हो भाई जी की नीयत के बारे में। लेकिन चाह कर भी उसकी आवाज़ नहीं निकल सकी। भाभी वैसे ही सिर झुकाए पलकें नीचे किये बैठी रहीं।  
 
      उसने देखा भाभी के होंठ कांपने लगे, उनके नथुने कंपकंपाने लगे झुकी पलकों के नीचे छुपी आँखों में समाया दुखों का सैलाब बाँध तोड़ कर बहने लगा। सुकुमा हतप्रभ रह गयी। उन आँसुओं में दर्द चीख रहा था। वह दर्द उसके दर्द से उपजा था या उनका खुद का दर्द था वह समझ नहीं पाई।  
"भाभी क्या हुआ ?" ऐसे कठिन समय में जब कि वह बिलकुल अकेली थी भाभी ही उसे एकमात्र सहारा नज़र आयीं लेकिन वे भी अपने दुःख में डूबी थीं। उनका दुःख क्या था सुकुमा ये तो नहीं जानती थी लेकिन वे दुखी है ये जरूर समझती थी। उनकी झुकी पलकों तले उसके लिए सहानुभूति है यह तो उसने महसूस कर ही लिया था और इसी लिए उनसे उम्मीद लगा बैठी थी।  
 
     दुःख और संवेदना जैसे चुप्पे भाव भी मुखर हो कर एक दूसरे को इस तरह जोड़ सकते हैं सुकुमा ने ये जाना था। भाभी का और उसका दुःख साझा न होते हुए भी उसमे कुछ तो साझा था, जो उनका मन आपस में जोड़ रहा था। हालाँकि वे कोई मजबूत सहारा नहीं थीं वे भी उतनी ही बेबस थीं जितनी सुकुमा।  रणवीर के जाने के बाद गहराया अकेलापन अपने सघनतम स्तर पर था और भाभी उस सघनता को तोड़ कर दिखने वाली रौशनी की एकमात्र किरण।  
    
     "भाभी भाभी कुछ कहिये, क्या हुआ?" तभी बाड़े में किसी की आहट हुई और अपने सिर का आँचल सँभालते हुए अपनी जूठी थाली ले कर भाभी उठ खड़ी हुईं।  
 
     वह दोपहर दोनों की चुप्पी, कशमकश और दर्द से और दिनों की अपेक्षा ज्यादा ही बोझिल थी। दिलों का बोझ दोनों को चैन नहीं लेने दे रहा था। वह बात करना चाहती थी और भाभी बताना चाहती थीं। सुकुमा जब पीछे आँगन में गयी भाभी ने उसका हाथ पकड़ कर बैठा लिया। रसोई की दीवार की छाँव तले कंपकंपाती आवाज़ में भाभी ने जो कुछ बताया उसने सुकुमा की साँस रोक दी। वह सपने में भी नहीं सोच सकती थी सच इतना वीभत्स हो सकता है।  
 
      भाभी अपनी पलकों तले जिस भयावह सच को छुपाये बैठीं थीं जिसकी काली छाया उनके चेहरे पर दर्द की स्थायी छाया बन कर ठहर गयी थी। ये जानकार सुकुमा सकते में आ गयी।  
 
     लरज़ती आवाज़ में उन्होंने कहा था "सुकुमा तू खुद को बचाना चाहती है तो कहीं भाग जा।" 
 
     "भाभी ये क्या कह रही हो आप? कहाँ जाऊँगी मैं।" 
 
     "कहीं भी जा बस अपने मायके मत जइयो तुम्हारे भाई जी उनका जीना मुहाल कर देंगे। वापस ले आयेंगे तुझे वहाँ से इसलिए चली जा किसी अनजान देश में।"  
 
      एक पल को सुकुमा को बचपन के मेले की याद आ गयी जब बापू का हाथ छूट गया था और वह उस भीड़ में नितांत अकेली थी। उसने कस कर भाभी का हाथ पकड़ लिया -"भाभी मैं कहाँ जाऊं?"
 
     "मुझे नहीं पता रे छोटी," भाभी बिलख पड़ीं या तो सब कुछ जैसा है वैसा स्वीकार कर ले, कर लेने दे तेरे भाई जी को उनके मन की, जब तक उनका मन नहीं भर जाता। बदले में खाना कपडा तो मिलता ही रहेगा या अपनी इज्ज़त बचा ले फिर भले कितनी ही ठोकरें खानी पड़ें। जब उन्होंने अपने भाई को नहीं छोड़ा तो तुझे कैसे छोड़ देंगे।" कह तो दिया भाभी ने फिर अपनी ही जबान काट ली और आँचल से मुँह ढाँप लिया।  
 
     "भाई को  … रणवीर को  … रणवीर को क्या किया भाई जी ने? भाभी बताओ मुझे भाई जी ने रणवीर को क्या किया।"
 
     "रहने दे छोटी जिस बात को जानकार सिवाय घुटन के कुछ नहीं मिलना है उसे न जानना ही ठीक है।" मुँह ढाँपे ही भाभी ने कहा।" 
 
     "नहीं भाभी" सुकुमा ने उनके दोनों हाथ पकड़ कर उन्हें झिंझोड़ दिया, उनके पैर छूते हुए बोली "भाभी पैर पड़ती हूँ तुम्हारे बताओ क्या कह रही थीं?" एक आशंका ने मन में पैठ कर ली थी। भाई जी ने रणवीर के साथ कुछ गलत किया क्या किया? 
 
     "मत पूछ छोटी ये बात मुझे सोने नहीं देती, सारी सारी रात आँखों में निकाल देती हूँ। तू अकेले होने के दुःख से जागती है लेकिन उसमे छल की पीड़ा तो नहीं है। हर दुःख की अपनी तासीर होती है उसके अनुसार उसके दर्द। कुछ दर्द सहन करने है इसलिए सह जाते है जबकि कुछ दर्द हमारे हिस्से में क्यों आये यही कशमकश जीने नहीं देती।" 
 
     सुकुमा ने अब तक खुद को संभाल लिया। वह धीमी लेकिन संयत आवाज़ में बोली - "भाभी जो दर्द मुझे मिला है वह तो जिंदगी भर कम नहीं होगा और उसे सहना ही पड़ेगा लेकिन उस दुःख के पीछे एक कारण है और वह कारण ना जानने की तड़प उसे और बढ़ा देगी। इतना तो समझ ही गयी हूँ कि रणवीर अपनी मौत नहीं मरा भाई जी ने कुछ किया है उसके साथ लेकिन क्या और क्यों ये बता दो। जान लूँगी तो आगे क्या करना हैनिश्चय कर पाऊँगी।"
 
     सुकुमा के स्वर की दृढ़ता सुन भाभी ने चेहरे से आँचल हटा कर उसकी आँखों में देखा। मासूम सी सुकुमा एक अटल निश्चय से भरी नज़र आयी। उसकी स्थिरता देख कर भाभी ने कुछ निश्चय किया। उन्होंने अपने आँसू पोंछे और उसकी ठोढ़ी पकड़ कर उसकी आँखों में देख कर बोलीं -"छोटी जो बात मैं बता रही हूँ उसे बहुत धीरज से सुनिओ और सुनने से पहले अपने कलेजे को पत्थर कर लो क्योंकि बाद में रोने गाने से कुछ होवेगो ना उल्टा तुम्हारी मेरी जान के खरीददार खड़े हो जावेंगे।" 
 
     सुकुमा साँस रोके इंतज़ार करती रही।  
 
     भाभी ने उठ कर बाहर जाकर रसोई का दरवाज़ा लगाया, पीछे आँगन के दूसरे छोर तक देख आयीं फिर सुकुमा के बगल में बैठ कर कहने लगीं -"तेरे भाई जी ने तुझे रणवीर के लिए पसंद किया था। तू सुन्दर है और गरीब परिवार की है ये दोनों बातें तेरा रिश्ता होने में काम आयीं। रणबीर अपने भाई जी का बहुत मान करते थे इसलिए उन्हें विश्वास था कि वो कभी उनके खिलाफ नहीं जायेंगे। तुम्हारी शादी के बाद से ही तुम्हारे भाई जी की नज़र तुम पर थी। वे छुप कर तुम्हे देखते रहे कभी काम करते, कभी नहाते या कभी तुम्हारे कमरे में। उन दिनों तुम दोनों अपने आप में ही मगन थे अपने आस पास की दीन दुनिया की तुम्हे खबर ही कहाँ थी?" 
 
     "एक दिन रणवीर ने तुम्हारे भाई जी को तुम्हे देखते हुए देख लिया। उस दिन तुम भैसों को चारा पानी दे रहीं थीं तुम्हारा आँचल खिसक गया था और तुम्हारे भाई जी अपनी गन्दी नज़रों से तुम्हारे शरीर को निहार रहे थे। मैं उसी समय लकड़ियाँ लेने पीछे के रास्ते से आई थी। तुम अपने काम में और तुम्हारे भाई जी अपनी नज़रों की भूख मिटाने में लगे थे। तभी सामने बाड़े तरफ से रणवीर वहाँ आया उसे शायद अपने भाई जी से कोई बात करना थी तब उसने उनकी गन्दी नीयत को पहली बार जाना। रणवीर को देख कर वे सकपका कर अपनी अधूरी हसरत लिए चुपचाप चले गए। मैं रणवीर की नज़रों का सामना नहीं कर सकती थी इसलिए तुरंत आड़ में हो गयी। उस दिन से रणवीर बहुत परेशान रहने लगा।" 
 
     "उस दिन के बाद बार बार कई बार रणवीर ने तुम्हारे भाई जी को तुम्हारे आस पास देखा। उन दिनों रणवीर बहुत परेशान रहने लगा था लिहाज का आवरण धीरे धीरे तार तार होते जा रहा था। एक दिन रणवीर ने उस आवरण को खींच अलग किया और तुम्हारे भाई जी से स्पष्ट शब्दों में तुमसे दूर रहने और तुम पर बुरी नज़र रखने से आगाह किया। ये सब बातें मेरी कोठरी के बाहर दालान में हुईं मैं कोठरी में ही थी सब सुन रही थी।"  
 
    "उस दिन तो तुम्हारे भाई जी ने रणवीर को गले लगा कर विश्वास दिलाया कि जो वो सोच रहा है ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन रणवीर के हाथों अपमान का दंश उनके कलेजे में चुभ गया, जिसे निकालने का उपाय उन्होंने अगले चार पांच दिनों में ही कर लिया।"  
 
     "रणवीर को नयी जमीन दिखाने और खरीदने के नाम पर वे उसे दूर गाँव के बाहर ले गए। वहाँ उन्होंने अपने एक आदमी को जहरीले साँप के साथ पहले ही पहुँचा दिया था। रणवीर को साँप से डसवा कर साँप खेतों में छोड़ दिया। रणवीर तड़पता रहा लेकिन वो उसे वहाँ से तभी लेकर आये जब वह तड़प तड़प कर ठंडा हो गया। रणवीर के जाने के बाद अब उनकी राह में कोई रोड़ा ही नहीं रहा। शोक के सवा महीने उन्होंने धीरज रखा अब वे फिर अपने गंदे इरादों को पूरे करने की कोशिश में लग गए।"   
 
     सुकुमा पत्थर बनी सुनती रही। भाई जी की कुत्सित भावना इस हद तक जा सकती है सुन कर वह सन्न रह गयी।  
 
     भाभी ने फिर कहा - "तुम्हारे भाई जी ने हमेशा से जो चाहा है वह पाया है। उनके सामने अम्माँ और बाबू साब को भी कुछ कहते नहीं देखा मैंने।  रणवीर का उनको यूँ ललकारना उनके अहं को चोट दे गया। उन्होंने कभी सोचा न था कि रणवीर उनकी मरजी के आगे सिर उठाएगा। उन्होंने तो उसका ब्याह ही इस बुरी नीयत से साथ किया था। जिस इंसान ने खुद को हमेशा सबसे ऊपर और सही समझा हो। परिवार में और बाहर सबको अपने सामने सिर झुका कर खुद की बात मानते देखा हो वह दूसरों की जिंदगी को, उसकी इच्छा को अपनी इच्छा से हीन ही समझता है। इस भावना को घर परिवार, रिश्तेदार, गाँव वाले लाड प्यार मान सम्मान या डर से पोसते रहते हैं। वहीं कोई उनकी इच्छा के आड़े आ जाये उसे बर्दाश्त करना उनके लिए असंभव होता है। इसकी तिलमिलाहट से उपजा क्रोध और कुंठा किसी की जान भी ले सकती है।"
 
      "अम्मांजी और बाबू साब को पता है ये सब?" सुकुमा ने सन्नाटा तोड़ते हुए पूछा।  
 
     "हाँ शायद पता है। एक दिन मैंने अम्माजी और बाबू साब को तुम्हारे भाई जी से कुछ बातें करते सुना था। अम्माजी रो रही थीं बाबू साब भी बहुत गुस्से में थे। ये रणवीर के जाने के चार पाँच दिन बाद की बात है।"  
 
     "पूछा नहीं उन्होंने भाई जी से कि उन्होंने ऐसा क्यों किया?" 
 
     "पूछा तो होगा या शायद न भी पूछा हो। अम्माजी तो सुबह से बाड़े में ही रहती हैं वहाँ से कहीं भी कोई आता जाता उन्हें दिखता ही होगा। हो सकता है वे जानती हों।" 
 
     "फिर उन्होंने कुछ किया क्यों नहीं भाभी कैसे अपने बेटे की मौत को ऐसे बर्दाश्त कर लिया?" 
 
     "क्या करते छोटी? एक बेटे को तो खो ही चुके थे अब दूसरे को खोने का कलेजा कहाँ से लाते? इसलिए रो धो कर वे भी चुप हो गए।"
 
     सुकुमा के दिमाग में सांकल टूटने वाली बात कौंध गयी। जब अम्मा सब जानती हैं फिर भी उस बात को उन्होंने कैसे उदासीनता से लिया। तो क्या बड़े बेटे की कुइच्छा छोटे बेटे की मौत के शोक पर भारी पड़ गयी? तो क्या अब वे भी भाई जी की नीयत को मौन समर्थन दे रहीं हैं? जब खुद के बेटे की मौत का दर्द उनका जमीर न जगा सका तो पराई लड़की का दुःख उनकी संवेदनाओ को कैसे जगा सकता है? ऐसे में सुकुमा अब न सिर्फ अकेली है बल्कि अपने कहलाने वाले पराये लोगों से घिरी है, और जो उसके दुःख को समझती है वो तो खुद इतनी अकेली है कि खुद को खुद का ही हाथ नहीं दे पा रही हैं। ऐसे में सुकुमा क्या करे, कहाँ जाए,किससे मदद की गुहार लगाए ? 
 
* * * 
    उस रात रसोई में सुकुमा फूट फूट कर रोई। उस रात सुकुमा फिर वैसे ही रोई जैसे उस दिन रणवीर की निर्जीव देह पर लिपट कर रोई थी। लेकिन आज तो लिपटने के लिए कोई निर्जीव आस तक नहीं थी। उसके लिए रणवीर ने अपनी जान दे दी। उसके लिए रणवीर इतना परेशान रहता था फिर भी उसने सुकुमा को कभी कुछ नहीं बताया। कितना बड़ा बोझ अपने दिल पर ले कर गया है वह। अब वह क्या करे? कहीं भाग जाए, लेकिन कहाँ? कब तक भागेगी और कब तक बच सकेगी? जब घर में भेड़िये छुपे हैं तो अनजान दुनिया के जंगली भेड़ियों से कैसे बच सकेगी? क्या करे कैसे अपनी आबरू बचाए जिसके लिए रणवीर ने अपनी जान दे दी। नहीं रणवीर की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाने देगी वह। चाहे जो हो भाई जी के बुरे इरादों को कभी पूरा नहीं होने देगी। सुकुमा ने फिर खुद को बरज दिया "चुप हो जा पगली रोने से कोई उपाय नहीं सूझेगा कुछ सोच क्या करना है। "
 
 
     सुकुमा जितना सोचती उसके दिल में आक्रोश भरता जाता। घर से भाग जाने की बात पर उसे अँधेरे में अपने चारों ओर भेड़ियों की लाल लाल आँखें, तीखे दाँत और नाखून चमकते दिखाई देते। उसका अंतस प्रतिरोध करता क्यों भागे वह एक अनजान भविष्य की ओर, जबकि उसकी जिंदगी को दुःख और अकेलेपन से भरने वाले यहाँ आराम से रहें।  
 
     नहीं उन्हें इस तरह चैन से रहने के लिए छोड़ कर वह अनिश्चितता के सागर में डूबने नहीं जा सकती। अब वह अकेली भी तो नहीं है उसकी कोख में रणवीर की निशानी है उसके प्यार की साक्षी। उस नन्ही जान को दर दर की ठोकरें खाने कैसे ले जा सकती है वह ? 
 
     कभी वह खुद को ही आगाह करती "अरे पगली तू इतनी बड़ी बड़ी बातें सोच रही है, लेकिन भाई जी के गंदे इरादों के सामने तू टिक भी सकेगी ? कब तक बचा पायेगी तू खुद को उनसे? जिस इंसान ने भाई होने की मर्यादा न रखी वह क्या तुझे छोड़ देगा? क्या करेगी, उससे लड़ेगी, कौन खड़ा होगा तेरे साथ किसके सामने रोएगी गिड़गिडाएगी, कौन सुनेगा तेरी गुहार ? 
 
     एक मन कहता ना बहुत रो ली सुकुमा, बहुत जी ली डर डर कर, अब तुझे मुँह खोलना ही होगा। जिस नंगे सच को सब चुपचाप ओढ़े बैठे हैं उसका आवरण हटा कर सबको उनकी नज़रों में नंगा करना ही होगा। तुझे लड़ना होगा मर्यादा का ये झूठा घूँघट हटा कर उनकी आँखों में ऑंखें डाल कर अपने और अपने बच्चे के हक के लिए बोलना ही होगा।  
 
      रणवीर ने भाई जी का मान रखा उनकी सच्चाई सबसे छुपाई और अपनी जान गँवा दी, अब अगर सच्चाई जानते हुए वह भी चुप रही तो अपनी इज्ज़त गँवा देगी। फिर क्या होगा? वह खुद से नज़रें मिला पाएगी? आज उसे भाभी का जो भावनात्मक सहारा है क्या वह बना रह पायेगा? उसके माँ बापू, भाई जी के सामने कब तक टिक पायेंगे? क्या वह उनकी जिंदगी भी नर्क कर दे? अनिश्चिंतता  तो दोनों तरफ है तो क्यों नहीं वह लड़े अपने स्वाभिमान के लिए, रणवीर के बलिदान के लिए, अपने बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए।  
 
     इस बुरी नीयत पर पड़े आवरण को खींच हटाना होगा।  भाई जी को उनकी ही नज़रों में नंगा करना होगा। जो बात सब जान कर भी अनजान हैं वही बात सबको सबके सामने बताना होगा।  
 
     रसोई के दरवाजे पर खटखटाहट हुई, सुकुमा उठ कर खड़ी हो गयी और धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में बोली "भाई जी वापस लौट जाओ ये दरवाज़ा नहीं खुलेगा" थोड़ी देर कोशिश के बाद सन्नाटा पसर गया।  
 
     अगली सुबह का सूरज एक निश्चय की रोशनी लेकर आया। अम्मा और बाबू साब को सुबह की चाय देने के बाद सुकुमा वहीं खड़ी रह गयी। 
 
     अम्मा ने उसकी ओर देखा और गुस्से में बोलीं "क्या सिर पर ही खड़ी रहेगी लाड़ी।" 
 
     अचानक सुकुमा ने घूँघट पलट दिया और दृढ़ स्वर में बोली- "अम्मा मेरी कोठरी की सांकल टूट गयी है उसे ठीक करवाना है।"  
 
     "इत्ती सुबह सुबह क्या राग ले बैठी चाय तो पीने दे चैन से। तुझे कोई शर्म लिहाज है कि नहीं तेरे बाबू साब यहीं बैठे हैं।" अम्मा गुस्से से तिलमिला गयीं।  
 
     अम्मा की ऊँची आवाज़ सुन कर भाई जी अपनी कोठरी से और भाभी रसोई से बाहर आ गयीं।  
 
     सुकुमा ने बिना विचलित हुए कहा -" अम्मा आप भी जानो हो मेरी कोठरी की सांकल अपने आप ना टूटी है तोड़ी गयी है। आठ दिन से भाई जी मेरे को दबोचने की कोशिश में लगे हैं मैं किसी तरह रसोई में छुप कर खुद को बचा रही हूँ।"  
 
     इतना सुनते ही भाई जी गुस्से में आग बबूला होकर हाथ उठा कर उसे मारने आगे बढे।" क्या कह रही है छोरी तू?" 
 
     उसने अपना हाथ उठा कर उन्हें रुकने का इशारा किया, वह अपने स्थान से इंच भर भी न हिली और सीधे उनकी आँखों में देखते हुए बोली -"गलत तो ना कह रही हूँ भाई जी ? आपने ही मेरी कोठरी की सांकल तुडवाई है न ? आप ही हो न जो झरोखे से म्हारे ताड़ो हो? आपने ही भैसों के बाड़े में मुझे दबोच कर पुआल पर पटका था न ? आप ही रोज़ रात रसोई का किवाड़ खटखटा कर खोलने और ना बच पाने की धमकी दे रहे हो न?" 
 
     "छोरी जबान पर लगाम दे।" भाई जी के नथुने दौड़ में भगाए बैल की तरह फड़कने लगे लेकिन सुकुमा की आँखों में दृढ़ खड़े सच ने उन्हें एक कदम भी आगे न बढ़ने दिया। 
 
     वह बाबू साब की ओर मुखातिब हुई और बोली -"बाबू साब आप भी जानों हो रणवीर अपनी मौत नहीं मरा है। उसे भाई जी के बुरे इरादे का पता चल गया था, बहुत परेशान रहता था वह उन दिनों। उसने मुझे बताया भी था कि भाई जी मुझ पर बुरी नीयत रखते हैं लेकिन मैं कुछ समझ पाती इस बात पर विश्वास कर पाती उसके पहले ही जमीन दिखाने के बहाने भाई जी ने उस सुनसान जगह पर ले जाकर उसे डस लिया। इन्होने भाई के विश्वास को डस लिया रिश्तों की गरिमा को जहरीला कर दिया।"
 
     "बाबू साब आप को सब पता है न? आप और अम्मा सब जानते हो फिर भी चुप रहे? एक बेटे के प्यार ने आपके मुँह सिल दिए लेकिन एक बेटे ने अपनी जान दी उसके लिए आपका दिल नहीं पसीजा?"
 
     कहते कहते सुकुमा आवेश में आ गयी। जिनके सामने कभी खड़ी नहीं हुई उनके सामने सच बोलते इतनी मजबूत हो गयी कि बिना हिचक के सीधे उनकी आँखों में  देख कर बोल पड़ी, और वे लोग जो सच को अपने स्वार्थ, अंधे प्यार और बुरी नीयत के आवरण में छुपा कर इज्ज़त पाने का दावा करते रहे इज्ज़त पाते भी रहे, वे आज बाड़े में उसी आवरण के चीथड़ों पर नंगे खड़े थे। सुकुमा की आवाज़ में तेज़ था, नथुने फड़क रहे थे साँस सच की आँच से तप रही थी, लेकिन वह रुकी नहीं बोलती रही। इतने दिनों के डर, बेबसी, बैचेनी, अविश्वास और अनिश्चय को परे झटक कर अपनी जिंदगी की डोर खुद थामने के लिए अपने तर्क देती सुकुमा के सामने भाई जी, अम्मा और बाबू साब स्तब्ध खड़े थे। सच का सामना करते उनके झूठ के हौसले पस्त हो गए थे। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन ये छोरी उन्हें उनकी ही नज़रों में इस तरह गिरा देगी।  
 
    बाबू साब की ओर दो कदम बढ़कर वह बोली -"बाबू साब आपके एक बेटे ने अपने भाई का मान बनाए रखने के लिए अपनी जान दे दी, अब मेरी इज्ज़त बनाये रखना इस घर की, आपकी जिम्मेदारी है। मैं आपका बहुत मान करती हूँ बाबू साब, आपके हाथ जोड़ती हूँ, मुझे इस घर में इज्ज़त से सुरक्षित रहने का जतन करो। आप म्हारे बड़े हो आपसे गुहार ना लगाऊँगी तो कहाँ जाऊँगी? भाई जी को आप ही समझा सको हो।"   
 
     सुकुमा फिर भाई जी की ओर देख कर बोली "भाई जी रणवीर ने आपका बहुत मान किया और मुझे भी हमेशा यही सिखाया। आपके मन में कभी रणवीर के लिए प्यार रहा हो तो मुझे बक्श दो। सुकुमा की आवाज़ में विनय थी लेकिन दीनता नहीं।  
 
     भाई जी ने अचानक भाभी की ओर देखा वे एकटक उनकी ही तरफ देख रही थीं। आज उनकी पलकें झुकी हुई नहीं थीं। वह सच जिसे वे अब तक पलकों के नीचे छुपाये हुए थीं आज हर चेहरे पर कालिख पोत कर सामने खड़ा था। भाई जी ने नज़रें झुक लीं। अपने माता पिता और बीवी के सामने खुद को बेनकाब होते देखना उनसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। वे वहाँ से भाग जाना चाहते थे लेकिन कदम साथ नहीं दे रहे थे। इस छोरी ने उनके वजूद को तार तार कर दिया था लेकिन उस पर क्रोध करने का साहस भी उनमे नहीं बचा था। वे स्तब्ध थे और कुछ सोच समझ ही नहीं पा रहे थे।  
 
     सुकुमा अम्मा जी की ओर मुड़ी और बोली "अम्मा अपने को बचाने के लिए मैं कहीं भाग जाती या अपनी जान भी दे देती लेकिन रणवीर की निशानी जो मेरी कोख में है इस घर का चिराग उसे दर दर की ठोकरे खाने कैसे ले जाऊं? लेकिन अपनी माँ की बेईज्ज़ती होते देखने के लिए उसे इस दुनिया में नहीं लाना चाहती।" कहते कहते सुकुमा का गला रुंध गया अब तक जुटाई हिम्मत ममता की आँच से पिघल कर आँखों के रास्ते बह निकली।  
 
     इस बात से जड़ खड़े सभी लोगों में जीवन का संचार हुआ। 
 
    अम्मा ने सुकुमा के कंधे पकड़ कर उसे भरपूर नज़र से देखा।" क्या कह रही है तू छोरी, मेरे रणवीर की निशानी, क्या सच?" 
 
     भाभी चबूतरे से उतर कर उसके पास आ खड़ी हुई उसकी ठुड्डी पकड़ कर उसका चेहरा ऊपर किया उनकी बड़ी बड़ी आँखों में आँसू झिलमिला रहे थे। अपने सिर को थोडा सा झुका कर उन्होंने आँखों में पूछा क्या ये सच है? 
 
     अपना चेहरा थोडा सा झुका कर सुकुमा ने हामी भरी और लज़ा कर अपनी पलकें झुक लीं। दोनों देर तक एक दूसरे के गले लगी रहीं। अम्मा ने बाबू साब को देखा उनकी आँखों से छलछलाई ख़ुशी उनकी मुस्कुराती मूंछों में समा रही थी। सिर्फ भाई जी वहाँ अवांछित से खड़े थे न वे ख़ुशी प्रकट कर पा रहे थे ना ही समझ पा रहे थे की क्या करें? वे अपनी कोठरी की तरफ जाने के लिए मुड़े तभी बाबू साब की आवाज़ आयी "ठहरो।" 
 
     सुकुमा और भाभी छिटक कर अलग हो गए सभी बाबू साब को देखने लगे।  
 
     "शमशेर, भाई जी को संबोधित करते हुए बाबू साब ने कहा तुमने एक अपराध किया, बहुत बड़ा अपराध लेकिन एक बेटा खोने के बाद तुम्हे खोने के डर से मैं चुप रहा। तुम्हे मिली सजा इस घर के हर सदस्य की सज़ा बन जाती। आज से सुकुमा इस घर की बहू नहीं बेटी है और अब ध्यान रहे कि उसकी इज्ज़त मेरी और इस परिवार की इज्ज़त है याद रहे ऐसा कोई काम न करना कि मज़बूर होकर कोई सख्त कदम उठाना पड़े। ध्यान  रखना यदि मैं बेटे के मोह में चुप रह सकता हूँ तो आने वाले पोते या पोती के लिए अपना मुँह खोल भी सकता हूँ, इस घर के दरवाज़े तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद भी कर सकता हूँ।"
 
     भाई जी इस बात से अन्दर तक काँप गए। बाबू साब ने फिर कहा आज से ये दोनों बहुएँ इस घर की बेटियाँ हैं और उन्हें खुश और सुरक्षित रखना हम सबकी जिम्मेदारी।" 
 
     भाई जी चुपचाप अपनी कोठरी में चले गए। खटिया पर बैठते बाबू साब ने कहा "सुकुमा बेटी एक कप बढ़िया चाय और पिलाओ।" 
 
     तभी नौकर ढोर खोलने आ गया। बाबूजी ने उससे कहा -"जरा रणवीर की कोठारी की सांकल देख कर उसे अभी ठीक करवाओ।"  
-कविता वर्मा  इंदौर