दिनांक 28 फरवरी रविवार की सांध्य बेला में 'पथिक' नाट्य संस्था इंदौर द्वारा नाटक "शोभायात्रा" प्रस्तुत किया गया । नाटक के लेखक हैं शफाअत खान और प्रस्तुति के निर्देशक थे वरिष्ठ रंगकर्मी , रूप सज्जा के विशेषज्ञ श्री सतीश श्रोत्री जी । 
कथानक है एक भाई यानी क्षेत्र के सफेदपोश गुंडे (श्री संजय पान्डे) द्वारा और उसके चमचे बाबूलाल (डा. पंकज उपाध्याय ) के द्वारा एक जुलूस में भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना अमूल्य योगदान देने वाले महापुरुषों की झांकी जैसे बाल गंगाधर तिलक ( श्रीअभिजीत नीमगांवकर ) सुभाष चंद्र बोस (श्री नंदकिशोर बर्वे) , महात्मा गांधी (श्रीअनुराग मिश्रा ) , पंडित जवाहरलाल नेहरु (श्री मिलिंद शर्मा ) , झांसी की महारानी लक्ष्मी बाई ( सुश्री शुभदा केकरे) आदि की झांकी निकाल कर भाई( गुन्डा) अपना उल्लू सीधा करना चाहता है ।  सभी व्यक्ति अपनी अपनी झांकी (स्वांग) भरकर महापुरुषों जैसी वेशभूषा धारण करके मेकअप और गेट अप लेकर एक नाटक की रिहर्सल वाले स्थान पर जुलूस निकलने पर अपनी बारी का इंतजार करते है । राजनीतिक एवं शासकीय कारणों से जुलूस के लिए अनुमति मिलने में देर होती है अब जो व्यक्ति किरदार निभाते हैं उनके व्यक्तिगत पाप धीरे-धीरे चर्चा के दौरान या झड़प के दौरान जग जाहिर होने लगते हैं । इसी तारतम्य में नाटक आगे बढ़ता है कभी-कभी महापुरुषों के चरित्र जब पात्रों पर हावी हो जाते हैं तो वे अपने अपने पात्र में मुब्तिला होने पर महापुरुषों के द्वारा दी गई शिक्षा और चरित्र निभाते हैं , व्यक्तिगत नोकझोंक भी होती रहती है । इतिहास भी टटोला जाता है , रेखांकित किया जाता है ।किसने कब इन महापुरुषों के साथ इतिहास में अन्याय किया या इन महापुरुषों की गलतियों के कारण देश के लिए में इनके द्वारा अन्याय हुआ , ये सारी बातें बड़ी व्यंगात्मक शैली में सशक्त संवादो एवं पात्रों के माध्यम से प्रस्तुत किए गए ।  प्रोफेसर द्वारा पेपर लीक करने का पाप , नेता बने सबनीस द्वारा चालिस करोड़ की हेराफेरी , वकील जाधव द्वारा किए अनैतिक कार्य , गांधी बने बापट की नारी लोलुपता , सबनीस नेता की रसिकता और बार्बी (फोटोग्राफर मीडिया कर्मी )(दिव्या मेहरा) द्वारा फोटोशूट के वक्त बापट और जाधव एवं सबनीस द्वारा पुरुषोचित कमजोरियों का प्रदर्शन ,  उच्चकोटि का हास्य पैदा कर गया ।
इन महापुरुषों के द्वारा दिया गया बलिदान व्यर्थ ही नजर आता है और ऐसा प्रतीत होता है  कि उनके नाम का सहारा लेकर वर्तमान युग में भष्ट और अनाचार में लिप्त लोग किस तरह जनता को बेवकूफ और मूर्ख बनाकर देश को लूट रहे हैं । प्रोफेसर द्वारा पेपर लिक करने के पाप को छुपाने के लिए वह नेता की लड़की को लड़की को निन्यानवे प्रतिशत नंबर देकर पास कर देता है , इसी प्रकार वकील का भ्रष्ट आचरण और गांधी बने बापट के कुकर्म यही साबित करते हैं कि देश में पूरे कुए में भांग घुली हुई है । इस देश का दुर्भाग्य है कि आज भी देश की संसद में और राज्यों की विधानसभाओं में अधिकांश सांसदों और विधायकों पर गंभीर किस्म के आरोप के मुकदमे न्यायालयों में विचाराधीन हैं । 

बापू का चश्मा गुमना , सुभाष चंद्र बोस की टोपी गुमना मात्र संयोग नहीं बल्कि इतिहास की बहुत बड़ी भूले कही जा सकती हैं या सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा । किस प्रकार सुभाष चंद्र बोस चोदह वोट पाने के बाद भी देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सके और एक वोट प्राप्त करने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बना दिया गया । अब हम मन मार कर यही कह सकते हैं कि 
लम्हों ने खता की थी 
सदियों ने सजा पाई ।
अभिनय के मामले में सभी मुख्य कलाकारों ने प्रभावित किया परंतु अनुराग मिश्रा (महात्मा गांधी ) , अद्वेत केकरे ?(चायवाला बालक ) दोनों ही बहुत अच्छा अभिनय  कर गए । परंतु अनुराग मिश्रा जब गांधी बनकर उनके उपदेश बता या सुना रहे थे तो आवाज में संवाद अदायगी मैं बुढ़ापे का ठहराव और शरीर की भाषा में भी बुढ़ापा नजर नहीं आया । हालांकि व्यक्तिगत अभिनय में तो स्वांग भरना था । वे स्वयं के पापमय होने के कारण डरने का अभिनय भी वे अच्छा कर गए । तारीफ तो करना पड़ेगी अद्वैत केकरे के अभिनय की उसकी संवाद अदायगी और देह भाषा ने उसके चरित्र से पूरी तरह आत्मसात कर लिया था , लगा ही नहीं कि वह अभिनय कर रहा था । बार्बी (पत्रकार के किरदार में )दिव्या मेहरा भी प्रभावित करती हैं । सफेदपोश भाई बने संजय पांडे और बाबू भाई बने डा. पंकज उपाध्याय ने भी आत्मविश्वास के साथ अभिनय किया । 
जहां तक निर्देशन का सवाल है श्री सतीश श्रोती जी के निर्देशन में कुछ दृश्यों में कसावट की कमी स्पष्ट नजर आती है । साथ ही नाटक के कई अंशों को संपादित भी किया जा सकता था ।
महारानी का किरदार निभा रही (शुभदा 
केकरे के द्वारा गर्भ में बच्चे को लोरी सुनाने वाला प्रसंग अप्रासंगिक लगता है । परंतु फिर भी  पेट में गर्भ होने के कारण सभी स्वांग रचने वालों की जान भी गर्भवती महीला के कारण बच जाती है । 
सागर शेन्डे टीम की नेपथ्य व्यवस्था ठीक
रही । रूप सज्जा सतीश श्रोत्री जी द्वारा एवं वेशभूषा सज्जा श्रीमती स्वाति श्रोत्री द्वारा बेहद प्रशंसनीय थी ।  रोशनी दीपके का पार्श्व संगीत और संगीत संयोजन 
नाट्यानुरूप होने के साथ प्रभावी था । तपन शर्मा की प्रकाश व्यवस्था भी दृश्यानुरुप थी ।  
एक बात और राहत भरी रही कि हिंदी नाटकों के लिए एक विशिष्ट दर्शक वर्ग करीब करीब तैयार हो गया है और आज अधिकांश , अधिकतम दर्शकों ने सहयोग राशि देकर ही नाटक देखा । यह 
नाटककर्मियों के लिए एक उत्साहवर्धन करने वाली और आर्थिक पक्ष को मजबूत करने वाली अच्छी बात कही जा सकती है 
यूं तो नाटक के लिए रविंद्र नाट्य ग्रह मात्र रु. पन्द्रह हजार में उपलब्ध होता है परंतु अन्य खर्चे जोड़कर यह करीब रु. चालिस हजार से पैंतालीस हजार में पड़ता है और एडवांस में रु. साठ हजार जमा करने पड़ते हैं जो एक शहर की किसी भी नाट्य संस्था के लिए बहुत कठिन और परीक्षा का विषय है । 
वैसे कुल मिलाकर नाटक की प्रस्तुति बहुत ज्यादा सफल तो नहीं पर फिर भी सफल कही जा सकती है ।  
'पथिक' नाट्य संस्था की सारी टीम को बहुत-बहुत बधाइयां एवं शुभकामनाएं । 

-चंद्रशेखर बिरथरे 'पथिक' सनाढ्य