'राष्ट्रीय किसान दिवस' पर विशेष -

हिमालय की चोटी पर जाकर तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों से भी बड़े तपस्वी हैं हमारे देश के किसान ..जो जाड़ा ,गर्मी ,बरसात हर ऋतु  को झेलते हुए खेतों में एक योद्धा की तरह डटे रहते हैं। कमर में एक फटी- मैली धोती बांधे, पेट को पीठ से चिपकाए, हल और फावड़े के साथ सूर्योदय से सूर्यास्त तक अनवरत जूझता है वो क्योंकि भार है उसके ऊपर देश के करोड़ों उदरों की क्षुधापूर्ति का।    
उसकी स्वयं की आवश्यकताएं बहुत नहीं है... बस स्वप्न है आंखों में कि इतना पैदा कर लूं इस धरती से.. कि परिवार का भरण पोषण कर सकूं। उसके स्वप्नलोक में ना तो क्लब हैं, ना माल, ना कोई पर्यटन की आकांक्षा। परे है उसकी दुनिया और ख्वाहिशें... इस रंगीन दुनिया से ।
हर पल अपने पसीने की नमी से फूटते हुए अंकुर को, उसके प्रति क्षण के विकास को ,उसमें फूटती नन्ही -नन्ही पत्तियों को, और नन्हीं बालियों के निर्माण को आशा भरी नजर से देखना ही उसकी खुशी है । जिसके बलबूते पर हम खाद्य आपूर्ति में आज सक्षम हैं ।
पर अफसोस कि वही भारत का किसान सदैव से ही अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। हालांकि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात किसानों के हित के लिए समय-समय पर अनेक प्रयास किए गए हैं ।इसी क्षेत्र में स्वतंत्र भारत के पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह (23 नवंबर 1902 से 19 मई 1987) के जन्मदिवस 23 नवंबर के अवसर पर उनके द्वारा किसानों के हित के लिए किए गए अतुलनीय योगदान के कारण प्रतिवर्ष 23 नवंबर को राष्ट्रीय किसान दिवस मनाया जाता है ।
बाबूगढ़ छावनी के निकट नूरपुर गांव, तहसील हापुड़, जनपद गाजियाबाद मेरठ में कच्ची मिट्टी और घास फूस के छप्पर वाली मड़ैया में 23 नंबर 1902 को जन्म लेने वाले चौधरी चरण सिंह ने अपने पिता मीर सिंह से नैतिक मूल्यों की धरोहर विरासत में पाई। और स्वतंत्रता सेनानी से लेकर प्रधानमंत्री तक के अपने सफर से उन्होंने साबित कर दिया कि निष्ठा और लगन अगर सच्ची है तो कोई भी बाधा हमारी राह नहीं रोक सकती।    
अपने अल्पकालिक प्रधानमंत्त्रित्व काल (28 जुलाई 1969 से 14 जनवरी 1980) में उन्होंने किसानों के हित में अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए। अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने "जो जमीन को जोते बोये वह जमीन का मालिक" इस सिद्धांत का क्रियान्वयन करते हुए उत्तर प्रदेश में जमीदारी प्रथा का उन्मूलन किया। लेखपाल के पद का सृजन किया, तथा 1954 में भूमि संरक्षण कानून पारित करवाया। अपने वित्तमंत्रित्व  व उप- प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रीय कृषि ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की। चौधरी चरण सिंह युवावस्था से ही गांधी जी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे, तथा जेल भी गए ।स्वतंत्रता के पश्चात वे डॉ राम मनोहर लोहिया के ग्रामीण सुधार आंदोलन में लग गए ,तथा आजीवन एक किसान नेता के रूप में सक्रिय रहे।   
भारतीय किसान चिरकाल से अनेक समस्याओं से जूझ रहा है ।गरीबी अभाव का संघर्षमय जीवन तो जैसे वह भाग्य में लिखा कर ही लाता है ।उसके हिस्से में तो ना आम लोगों की तरह कोई राष्ट्रीय छुट्टी ,ना ग्रीष्मकालीन अवकाश ,ना ही कोई सर्दियों की छुट्टियां आती हैं। जाड़े की ठिठुरती रातों में जब लोग घरों में चैन से सोते हैं ,उस समय हमारा किसान खेतों में पानी लगाता है ।गर्मी की तपती लू में अपने खेतों में काम करता है, मूसलाधार बारिश में मिट्टी में सने हुए पैरों से काम करता है। कभी खेतों में सूखती फसल के लिए चंद बूंदों की बारिश की आस लगाते हुए आसमान ताकता है तो कभी खलिहानों में पड़ी फसल के दौरान घिर आए बादलों से थमने की गुहार लगाता है। इस सबके बाद भी फसल की सही कीमत  के लिए दर-दर भटकता है ।
किसानों की समस्याओं की इति यहीं  तक नहीं है इसके अतिरिक्त राजनीतिक दल और सियासी चालों में भी किसान को मोहरा बनाया जाता है। पक्ष विपक्ष की राजनीति में जूझता किसान एक नए भंवर में फंस जाता है ।वर्तमान समय में केंद्र सरकार के 3 नए कानूनों के विरोध में दिल्ली बॉर्डर पर भयंकर ठंड में आंदोलन करते किसान संगठन अनेक समस्याओं से जूझ रहे हैं।
कभी सूखा कभी अनावृष्टि से जूझता हुआ किसान अभाव में पैदा होता ,अभाव में पलता ,और अभाव में ही मर जाता है ।उसकी स्वयं की इतनी समस्याएं हैं कि उसके लिए नई समस्या खड़ी करना कहां से तर्कसंगत है ।उचित होगा किसानों के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार किया जाए कि वह पूर्ण उत्साह से उत्पादन में सक्रिय रहे ताकि हम दोबारा अपनी खाद्य आपूर्ति के लिए किसी और पर निर्भर ना हो। देश का किसान हैं... तो हम हैं । हम आशा करते हैं कि किसान शीघ्र ही अपनी सभी समस्याओं जीत कर नए भारत के योगदान में इसी प्रकार अपना सक्रिय देता रहेगा।
   

       - सोनिया सिंह

एम ए नेट, पीएचडी शोधार्थी
                    बांदा उत्तरप्रदेश