चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने भारत पर तंज कसते हुवे कहा कि चीनी लोग अगर भारतीय उत्पादों का बहिष्कार करना चाहे तो ज्यादा उत्पाद खोज नही पाएंगे। यह बात काफी हद तक सही भी है । आनन्द महिंद्रा ने इसको सबसे प्रेरक टिप्पणी मानते हुए उकसाने के लिए चीन को शुक्रिया कहा है। साइबरवार में 59 एप को बैन करने का निर्णय भारत सरकार द्वारा देर से उठाया गया सही निर्णय कहा जा सकता है ,डाटा चोरी जैसे संगीन आरोप काफी लंबे समय से लग रहे थे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार की भी कुछ मजबूरियां आड़े आ रही थी, राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर निर्णय करना हर देश का सार्वभौमिक अधिकार है जिसे विश्व की कोई व्यवस्था नकार नहीं सकती ।सोचने वाली बात है कि सिर्फ एप्लीकेशन बैन करके ड्रैगन से निपट सकते हैं क्या ?तो इसका उत्तर होगा नहीं ,बिलकुल नही। चीन की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह नहीं है जो टिकटोक पर बैन से ढह जाएगी,उसके लिए सरकार को एक दीर्घकालिक बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी । लोकतांत्रिक व्यवस्था की सरकार में एक समस्या यह है कि 5 वर्ष से ज्यादा की सोच वाली नीति नहीं बन पाती ,क्या पता सरकार आये या न आये, इसलिए अब समय आ गया है कि राजनीतिक मतभेद भूलकर सभी राष्ट्रीय पार्टियों को विदेश नीति पर एकजुट रहकर कम से कम आगामी 20 वर्ष के लिए राष्ट्रीय नीति का निर्माण करना होगा ,पार्टी हितों को ताक में रखकर राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि मानकर विदेश नीति नीति,रक्षा नीति ,अंतरराष्ट्रीय संबंध में एकजुटता का परिचय देना होगा । आपसी मतभेद भले हो पर मनभेद नहीं होना चाहिए । चीन से आयातित सामान आकर्षक व सस्ता होता है क्योंकि वहाँ बड़े पैमाने पर ग्राहक की रूचि जानकर उत्पादन होता है(रुचि डाटा चोरी से पता चलती है) चीन में लेबर लॉ फैक्ट्री मालिकों का गुलाम है।इसका समाधान है विकल्प ढूंढ कर उसी सामान को ताइवान, दक्षिण कोरिया व वियतनाम से आयातित किया जाए ताकि दुश्मन का दुश्मन मजबूत हो (चाणक्य नीति के अनुसार) वही इन देशों की कंपनियों को भारत भूमि पर उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जाए, डायरेक्ट फॉरेन इन्वेस्टमेंट हो जमीनी स्तर पर संरचना खड़ी हो, देश में रोजगार बढ़े। अफसरशाही ,लाइसेंस राज, बिजली कटौती जैसी औद्योगिक समस्याओं को दूर करके प्रतिस्पर्धायुक्त शांत वातावरण मुहैया करवाया जाए। शिक्षा नीति में फेरबदल करके कक्षा 6 से कौशल आधारित शिक्षा दी जाए जिसमें मोबाइल हार्डवेयर, रिपेयरिंग ,कंप्यूटर सॉफ्टवेयर ,मशीनों के स्पेयर पार्ट्स ,डाई बनाना, इंजन की क्रिया विधि व मरम्मत, इंजन निर्माण, औद्योगिक उपकरणों की बनावट ,बॉयलर की संरचना जैसे कोर्स शामिल हो यानी बिना इंजीनियरिंग किए कक्षा 12 तक एक इंजीनियर का पूरा नॉलेज विद्यार्थी को हो जाए, भारत में इंजीनियर किताब पढ़ लेता है पर व्यवहारिक ज्ञान उसको फिर भी नहीं मिलता है । सामाजिक स्तर पर हाथ से कार्य करने वाले को सामाजिक सम्मान दिया जाए ,भारतीय समाज में आज भी उनको हेय दृष्टि से देखा जाता है सफेद कॉलर काम में कम तनख्वाह मिलने पर भी युवा कार्य करने के लिए तैयार हो जाएंगे पर हस्तकौशल आधारित काम नही करेगा। पानीपुरी वाला अगर मेहनत से पैसा कमाता है तो उसको भी सम्मान मिलना चाहिये। श्रम का सम्मान होना चाहिए ऐसी मानसिकता विकसित करनी होगी। रक्षा अनुसंधान विनिर्माण क्षेत्र में विशेष ध्यान देने की जरूरत है विदेशों से आयातित साजो-सामान पर कब तक निर्भर रहेंगे ? आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम बढ़ाना ही होगा व्हाट्सएप और फेसबुक जैसी एप्स भारतीय प्रतिभा अभी तक क्यों नहीं बना पाई? इसमें भी साजिश की बू आती है ,सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में भारत की क्षमता को पूरा विश्व एक स्वर में सलाम करता है फिर क्या कारण रहा होगा समझ से परे है। भारत सरकार को इस दिशा में युवाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए । चीन का मुकाबला करने के लिए उसी की सोच को पढ़कर उसी की शैली अपनाकर बेहतर जवाब दिया जा सकता है चीन की अर्थव्यवस्था को जानने वालों को पता है चीन ने जमीनी स्तर पर कितनी मेहनत की है ,उसकी कौशलशक्ति श्रम आधारित अर्थव्यवस्था ड्रैगन की तरह मजबूत है ,उसे मुकाबला करने के लिए भारत निर्माण के टाइगर को जगाना होगा। एशियाई हाथी की चिंगाड से चीन को बहरा करना होगा। इस हेतु दीर्घकालिक बहुआयामी सामरिक नीति ,सही विजन और सही दिशा की जरूरत है वरना तो वही बात होगी कि पड़ोसी आपका खेत पर कब्जा कर ले और बदले में आप उसे फेसबुक पर ब्लॉक मार दे। 

-अशोक कुमार सेन

निमाज शहर पाली जिला राजस्थान 

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